हारना बुरा क्यों लगता है?

जो परिणामो पर निर्भर है, वो तो हार-जीत के बीच में झूलता रहेगा; वो जीत कर भी नहीं जीतेगा, वो सदा हारा ही हुआ है क्योंकि उसकी जीत कभी आखरी नहीं होगी। कभी तुमने किसी को आखरी जीत तक पहुँचते देखा है? जो हारे हैं वो तो हारे ही हैं; जो जीते भी हैं वो और भी बड़े हारे हैं क्यूँकी उनको अभी भी डर लगा हुआ है कि जीत छिन न जाए; क्यूँकी उनको अभी भी अपेक्षा है कि इससे बड़ी कोई जीत संभव है।
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

पता भी है कौन बचा रहा है तुम्हें?

‘आनंद’ क्या है?

जब मन पर न सुख हावी है, न दुःख हावी है,
तब मन का जो निर्बोझ होना है, जो ख़ालीपन है,
उसे ‘आनंद’ कहते हैं।

सत्य और संसार दो नहीं

धार्मिक आदमी वो नहीं है जो मंदिर जाता है, धार्मिक आदमी वो है जिसे मंदिर जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि उसके लिए हर दिशा मंदिर है | वो जिस जगह खड़ा है वो जगह मंदिर है | वो मंदिर को अपने साथ लेकर चलता है | वो है, धार्मिक आदमी | वो विभाजन कर ही नहीं सकता | वो रेत पर खड़ा है तो रेत मंदिर है, पत्थर पर खड़ा है तो पत्थर मंदिर है, इमारत पर खड़ा है तो इमारत मंदिर है |

उसको किसी मूर्ति की आवश्यकता नहीं है, उसको किसी विशेष कक्ष की आवश्यकता नहीं है कि “यहाँ पर ही मेरी पूजा होगी” | जितनी भी मूर्तियाँ हैं, जो भी कुछ मूर्त रूप में है, वही पूजनीय है |

आप ही मूल आप ही शूल आप ही फूल

कुछ बँटा हुआ नहीं है, सब एक है। बँटा हुआ दिखता है, क्योंकि मन बँटा हुआ है। और जिस क्षण मन बँटा हुआ नहीं रहता, उस क्षण वो समय के पार देखने लगता है।

इसीलिए संतों को अक्सर भारत में ‘त्रिकाल-दर्शी’ कहा गया। ‘त्रिकाल-दर्शी’ का अर्थ यह नहीं है कि – वो यहाँ बैठे-बैठे भविष्य देख रहे हैं, घटनाएँ देख रहे हैं। ‘त्रिकाल-दर्शी’ का अर्थ यही है कि – वो बँटा हुआ नहीं देखते, वो समय के गुलाम नहीं हैं। वो बीज में पेड़ को, और पेड़ में बीज को, और दोनों में समष्टि को देखते हैं।

फूल-मूल की अभिव्यक्ति

आप जो कुछ भी कर रहे हैं, जैसे भी जी रहे हैं, उसमें क्या आपको कुछ भी ऐसा मिला है, जिस पर परायेपन की छाया न हो? या यह पूछ लीजिये अपनेआप से कि, “क्या मुझे संपूर्ण अकेलेपन का एक भी क्षण उपलब्ध होता है?” वही आपका अपना होता है। सुन्दर, पूर्ण अकेलापन। और वो अकेलापन जगत से भागने वाला नहीं होता है, वो अकेलापन आपकी अपनी पूर्णता का एहसास होता है। जहाँ भी दूसरा मौजूद है, वहीँ आपकी अपूर्णता मौजूद है। नहीं तो दूसरे के लिए जगह कैसे बनती।

और यदि मन और विचारों की भाषा में बात करनी हो, तो पूछ लीजिये अपने आप से कि, “क्या दिन भर में कोई भी क्षण ऐसा उपलब्ध होता है, जब मन पर विचार हावी न हों?” आप कहेंगे, “विचारों का आना-जाना तो चलता ही रहता है, प्रवाह है”। तो मैं कहूँगा, “ठीक, विचारों का आना-जाना तो चलता रहे, तो इतना ही बता दीजिये कि ज़रा भी अवकाश आपको ऐसा उपलब्ध होता है, जब आप विचारों से अनछुए रहें। ठीक, विचारों का आना-जाना चलता रहता है। क्या कभी ऐसा होता है कि आप विचारों से अनछुए रहें?”

परिपक्वता क्या है?

प्रश्न: सर, परिपक्वता क्या है? वक्ता: (१८-२२ वर्ष की आयु के विद्यार्थियों की सभा को संबोधित करते हुए) यह शब्द ‘परिपक्वता’ हम सभी को अपने लिए महत्वपूर्ण

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