कर्त्तव्य सज़ा है नासमझी की

कर्त्तव्य संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारो निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ (अष्टावक्र गीता अध्याय १८, श्लोक ५७) वक्ता: ‘सेंस ऑफ़ ड्यूटी’, कर्त्तव्यों के बारे में बात

भगवान क्या हैं ?

स्वतंत्रता क्या है? हम नहीं जानते। सत्य क्या है? हम नहीं जानते। शिक्षा क्या है? हम ये भी नहीं जानते। मैं कौन हूँ? ये तो बिल्कुल ही नहीं जानते। पर इन सब बातों के बारे में हमने कुछ-कुछ सुन रखा है और इनको मान लिया है। तो इस प्रश्न को अलग से लेकर के नहीं देखा जा सकता कि ‘भगवान् क्या है, सत्य क्या है ?’

तुम्हें स्वयं ही खोजना पड़ेगा

शिक्षक दो तरीके के होते हैं, एक जो जानकारी देते हैं, जानकारी सदा बाहर से आयेगी, और दूसरे वो जो तुमसे कहते हैं कि खुद खोजो। जहाँ तक निम्नतर शिक्षा का सवाल है, शिक्षक तुम्हें जानकारी दे सकता है कि ए.सी. कैसे चलता है, कैमरा कैसे चलता है, वो सब जानकारी बाहर से आ जायेगी। पर जब जीवन शिक्षा की बात हो रही है, तो गुरु तुम से यही कह सकता है कि बेटा, खुद तलाशो।

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः

वक्ता: एक उपनिषदिक् वाक्य है: नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः जो बलहीन है वो कभी भी अपने करीब नहीं पहुँच सकता| जो इतना डरपोक, मुर्दा और निर्बल है

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