आध्यात्मिक प्रतीक सत्य की ओर इशारा भर हैं

बहुत साधारण सी बात है ये, कि उसी में सब कुछ है, और उसके बाहर कुछ नहीं है। जो इस बात को बूझ जाए, वो सब कुछ जान गया।

संतों ने तो बहुत सरल बातें कही हैं। कुछ उन्होंने कभी टेढ़ा-टपरा करा ही नहीं। टेढ़ा-टपरा आदमी का मन कर देता है उसको।

स्वस्थ मन कैसा?

एक चीनी गुरु थे, वो जंगल ले गये अपने शिष्यों को| वहाँ पर कुछ खड़े हुए पेड़ थे और कुछ कटे हुए पेड़ थे|

गुरु ने अपने शिष्यों से पूछा, “बताओ ज़रा कुछ पेड़ खड़े हुए क्यों हैं और कुछ पेड़ कटे हुए क्यों हैं?”

शिष्यों ने कहा, “जो काम के थे, वो कट गये और उनका उपयोग हो गया|”

गुरु ने पूछा, “और ये जो खड़े हुए हैं, ये कौन से हैं”? शिष्य बोले, “ये वो हैं, जो किसी के काम के नहीं थे|”

गुरु बोले, “बस ठीक है, समझ जाओ|”

प्रतियोगी मन – हिंसक मन

प्रश्न: सर प्रतियोगिता से डर लगता है। ऐसा क्यों? वक्ता: प्रतियोगिता का डर है क्योंकि प्रतियोगिता का अर्थ ही है, डर। केवल डरपोक लोग ही

निसंकोच होना क्या है?

प्रश्न: सर, ‘फ्रैंक'(निसंकोच) शब्द का क्या अर्थ है? हम कब निसंकोच होते हैं? वक्ता: ‘फ्रैंक’ का अर्थ है सीधा, सपाट, सरल, अबाधित| संकोच शब्द समझती

पुरुषार्थ या प्रारब्ध?

प्रारब्ध का अर्थ है, ‘मैं मशीन हूँ’ और मशीन का कोई माई-बाप नहीं होता| मशीन के पास चेतना ही नहीं है अपने माई-बाप जैसा कुछ सोचने की| समर्पण का अर्थ होता है, ‘मैं जान गया कि क्या यांत्रिक है, और मैं उसमें नहीं बंधूंगा, समझ गया’| यह ही समर्पण है|

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