आनंद की तलाश

तुम बार-बार आनंद की ही तलाश करते हो क्योंकि तुम्हारे मर्मस्थल में याद बसी है उसकी।जैसे कोई बचपन में ही घर से बिछुड़ गया हो, और उसे घर की, माँ की, धुंधली-सी स्मृति बुलाती हो।

आनंद की तलाश तुम्हें इसलिए है क्योंकि आनंद तुम्हारा घर है, स्वभाव है। उसके बिना चैन कैसे पाओगे तुम? पैसा, इज्ज़त, उपलब्धियाँ – इनके साथ भी विकलता बनी ही रहेगी। माँ का विकल्प खिलौने नहीं हो सकते।

मन ने जो पकड़ा सब अधूरा, मन कहाँ जान पाएगा पूरा

जो असली है, वो तुम्हें दिया ही नहीं जा सकता।

वो तो तुम्हें अपनी मर्जी से, अपनी निष्ठा से, अपनी सहमति और श्रद्धा से खुद ही पाना होता है।
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श्री प्रशांत ‘मिथक भंजन यात्रा’ का दूसरा चरण धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में आरम्भ कर रहे हैं।

25 अप्रैल से।

कृपया अपनी जगह आरक्षित कर लें।

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