नया डराता है, नया ही बुलाता है, नया मृत्यु है, नया ही जीवन है

जिन्हें वास्तव में नया चाहियें वो नए कि आकांक्षा न करें। नए की आकांक्षा पुराने को कायम रखेगी। नए की आकांक्षा तुरंत नए को एक रूप दे देती है, एक आकार दे देती है, एक सीमा दे देती है। और फिर नए को जो रूप दिया गया है, आकार दिया गया है, सीमा दी गयी है, ये जानना तुम्हारे लिए सहज होना चाहियें कि वो सब कुछ तुम्हारी ही कल्पना, स्मृति और अतीत से आ रहा है। फिर नए का निर्धारण पुराना कर रहा होता है इसलिए नए को नया कह ही नहीं सकते। उस नए को नया कहना भूल होगी।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

आवेदन भेजने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

पारिवारिक माहौल से विचलित मन

प्रतिक्षण मन के सामने विकल्प ही विकल्प होते हैं। हम जान नहीं पाते क्योंकि हम ध्यान नहीं देते कि लगातार चुनाव की प्रक्रिया चल ही रही है। मन किस आधार पर चुनाव करता है?

मन इस आधार पर चुनाव करता है कि उसको क्या बता दिया गया है कि महत्त्वपूर्ण है।

तुम जो भी कुछ मन को बता दोगे कि महत्त्वपूर्ण है, मन उसी को आधार बना कर के निर्णय ले लेगा!
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने के और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को व्यर्थ न जाने दें।

तिथि: 24-27 मार्च
आवेदन हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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गुरु जो तुम्हारे नकली सत्यों को नकली दिखा दे

गुरु के साथ यही फ़ायदा है तुमको कि वो तुम्हारी पकड़ में भी है और तुम्हारी पकड़ से बाहर भी है। हरि को कैसे निहारोगे? वो तुम्हारी आँख में समाएगा कहाँ? हरि का कोई रूप है, रंग है, आकार है कि तुम हरि को निहार लो? गुरु का है।
गुरु को निहार सकते हो। अच्छी बात है। सीढ़ी है न वो। रूप, रंग, दृष्टि से शुरू करता है और अ-रूप, अदृश्य में ले जाता है। तुम्हारे पास विकल्प है कहाँ हरि को निहारने का?

तो इसीलिए संतों के पास जब भी यह चुनाव आता है कि हरि को चुनूँ या गुरु को चुनूँ । वो बेख़ौफ़ होकर गुरु को चुन लेते हैं।
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विचार नहीं वास्तविकता

विचार वास्तविकता का विकल्प बन जाता है।

ये ही तो हम करते हैं न अपनी कल्पनाओं में? जो हम वास्तविकता में नहीं कर पाते, हम उसकी कल्पना करना शुरू कर देते हैं। ये ही है न? विचार वास्तविकता का विकल्प बन चुका है।

तुम्हारी जो ऊर्जा सीधे कार्य में निकलनी चाहिए थी, वो ऊर्जा फ़ालतू ही कल्पना करने में जा रही है। ये उस ऊर्जा का विरूपण है।

मैं दुविधा में क्यों रहती हूँ?

माया किस रूप में तुम्हारे मन में घुसी है, ये जानने का — मैं दोहरा रहा हूँ — यही तरीका है कि देख लो कि दिन रात किसके बारे में सोच रहे हो? तुम समाज सेवा के बारे में सोच रहे हो, तो माया समाज सेवा बन के आ गई है। तुम धर्म के बारे में सोच रहे हो तो, माया धर्म बन के आ गई है। इसीलिए लाओ त्सू तुमसे कहता है न कि जब प्रेम नहीं होता तो प्रेम के बारे में सोचते हो। जब धर्म नहीं होता तो धर्म के बारे में सोचते हो। जिस धर्म के बारे में सोचा जाए वो धर्म, धर्म नहीं माया है। जिस प्रेम के विषय में सोचना पड़े, और जो मन में उमड़ता-घुमड़ता रहे, वो प्रेम नहीं है माया है।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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