जीवन में क्या चुन रहे हो, गौर करो || आचार्य प्रशांत (2019)

आदमी कितना हारा हुआ है, ये उसे ही पता चलता है, जिसने जीतने की पूरी कोशिश कर ली है।

जो जीतने की कोशिश ही नहीं कर रहा, जो साधना ही नहीं कर रहा, उसको सबसे बड़ा नुकसान यही होता है कि वो आजीवन इसी भ्रम में जीता है कि – “साहब अभी हमने कोशिश ही नहीं की है। जिस दिन हम मैदान में उतरेंगे, मैदान हमारा है”।

मैदान में उतरो न।

मैदान में उतरोगे, तभी तो अपनी गहरी शिकस्त का अहसास होगा।

बाज़ी ले गए कुत्ते

जैसी ये पूरी दुनिया, मैं धरती की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं पूरी दुनिया की बात कर रहा हूँ। जैसी ये पूरी दुनिया है, उससे यदि ज़रा भी अलग होती तो ये पौधा नहीं हो सकता था। पूरी दुनिया जब इक्कठी हुई है, तब ये पौधा निकला है। सूरज न होता तो क्या ये पौधा हो सकता था? पूरी दुनिया में कुछ भी यदि कम या ज़्यादा होता तो ये पौधा नहीं हो सकता था। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ यही है, पूरी दुनिया ही है जो इस पौधे के रूप में दृश्यमान हो रही है, प्रकट हो रही है। अपने आप में वो पूरी दुनिया को समाये है। अब उसे जानना क्या है? अब क्या बचा जानने को? जो कुछ जानने लायक था, वो तो मैं हूँ। क्या जानना है? शेष क्या रह गया है? समझ रहे हो बात को?

ज्ञान अर्जित करने की बीमारी हमें है, सूचनाओं को संग्रह करने की बीमारी हमें है, न जीने की बीमारी, हमें है। दिमाग में बैठे रहने की बीमारी, हमें है। किसी पौधे की तरफ जब देखो, तो पौधे की तरह मत देखो, नाम मत दे दो कि पौधा है। समस्त प्रकट हो रही है। जो टोटल  है, जो पूर्ण है, वो इस पौधे के रूप में तुम्हारे सामने है। उसे झुक कर के, प्रणाम करना सीखो। एक नन्हा सा घास का तिनका भी है ना, वो अपने आप में पूरी कायनात को समेटे हुए है। उसे नन्हा मत समझ लेना।

इससे बड़ी भूल नहीं हो सकती कि तुम जानवरों को हीन समझो। इससे बड़ी मूर्खता नहीं हो सकती। और ये बात बिलकुल मन से निकाल दो कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा कुछ भी नहीं है। बिलकुल ऐसा कुछ नहीं है। ये बातें भी तुम्हीं ने कह दी हैं, कि मैन इज़ गॉड्स बेस्ट क्रिएशन।  गॉड  नहीं कहने आया था। वो सारी किताबें तुम्हारी ही हैं, जिसमें तुम ये दावा कर रहे हो, कि हम सर्वश्रेष्ठ हैं। अब जब तुम कहोगे तो तुम तो यही कहोगे, और कोई जानवर कभी कुछ कहने आएगा नहीं। वो कहेगा, इतनी भी परवाह कौन करे कि हम बताएँ कि कौन सर्वश्रेष्ठ है।

आचार्य प्रशांत
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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

प्रेम में तोहफ़े नहीं दिए जाते, स्वयं को दिया जाता है

जहाँ प्रेम होता है, वहाँ लुक्का-छुप्पी नहीं होती। ऐसा नहीं होता कि ये एक विशेष चीज़ है, तुम्हारी है। विशेष हो कि निर्विशेष हो, जैसे हैं तुम्हारे हैं और खबरदार अगर तुमने ठुकराया। और फिर यह भी नहीं होता कि साल में एक दिन लाए हैं खीर तुम्हारे लिए, फिर तो साल में जो भी बनेगा, जिस दिन भी बनेगा तुम्हारा ही है।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com par
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संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

3.) बोधसत्र का सीधा ऑनलाइन प्रसारण
आवेदन हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com
या संपर्क करें:
श्रीमती अनुष्का जैन: +91 9818585917

4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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सुनने का वास्तविक अर्थ

विचार, विचार को पकड़ता है और मौन, मौन से जुड़ता है। मन शब्दों के अलावा कुछ सुन नहीं सकता, मौन को मौन ही सुनेगा। कीमत सिर्फ़ मौन की है। सुनने का अर्थ है इधर के मौन ने, उधर के मौन से एका कर लिया। मौन, मौन से जुड़ गया; अनंतता, अनंतता से मिल गई। सुनने का अर्थ है: ‘’मैं, मैं न रहा, तू तू न रहा; मैं भी खाली, तू भी खाली।’’ खाली, खाली से मिल गया; पूर्ण पूर्ण से मिल गया। अपूर्ण कभी पूर्ण से नहीं मिल पाएगा। अपूर्ण और पूर्ण तो आयाम ही अलग-अलग हैं, उनका कोई मिलन नहीं होता। पूर्ण से मिलने के लिए, पूर्ण ही होना पड़ता है। मौन को सुनने के लिए, मौन ही होना पड़ता है।
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दुर्बलता को पात्रता कहना ही भिक्षावृत्ति है

जो इंसान खुद भिखारी नहीं होगा, वो दूसरे भिखारियों के लिए भी दया की भावना नहीं रखेगा।
तो यह तो एक आपसी साजिश है, वो तो अपने ही समुदाय के बीच में है। जिसमें हमारा भ्रम है कि एक भिखारी है, और दूसरा दाता है। यह तो भिखारियों की आपसी मण्डली है, जिसमें एक दूसरे को थोड़े बहुत पैसे दिए जा रहे हैं। अभी चौराहे पर देते हैं, फिर गाड़ी लगा कर ऑफिस में जाकर हाथ फैला देंगे। तो कौन भिखारी है और कौन नहीं है?
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