तुम्हें हक़ क्या है शिक़ायत करने का?

तुम कहते हो कि बचपन से लेकर आज तक मेरी परिस्थितियाँ ठीक नहीं रही मेरे साथ, ऐसा-ऐसा हो गया। मेरा पिछले पच्चीस सालों का इतिहास गड़बड़ है। और अब तुम वो पच्चीसवें साल में है, वो खड़ा होकर क्या प्रार्थना कर रहा है? कि बदल दो सब कुछ। और वो ये भी कह रहा है कि मेरे साथ जो हुआ, ठीक नहीं हुआ। ये जो व्यक्ति खड़ा है, ये कौन है? ये पिछले पच्चीस वर्षों का उत्पाद है। पिछले पच्चीस वर्षों में तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ है, उसी से तो तुम निकले हो।  

और यही जो तुम है, यही जो मन है, ये प्रार्थना कर रहा है कि, जो हुआ वो ठीक नहीं था, उसे बदल डालो। वो बदला तो तुम बचोगे कहाँ? वो बदला तो तुम कहाँ बचोगे? बात समझ में आ रही है? वही यहाँ पर कहा जा रहा है “तुम क्यों विवाद में पड़ते हो?” “तुम क्यों अपनी ओर से कोई प्रतिरोध दिखाते हो कि मुझे ये हालात क्यों दिए गये?” ये पूछने का तुम्हे क्या हक है कि मुझे ऐसा क्यों बनाया? तुम अगर सवाल भी आज कर रहे हो कि मुझे ऐसा क्यों बनाया, तो इसीलिए कर पा रहे हो क्योंकि उसने ऐसा बनाया, अन्यथा तुम सवाल भी नहीं कर पाते।

आचार्य प्रशांत
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१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. परमचेतना नेतृत्व
नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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८. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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१०. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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११. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

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फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

मूल्य देने से पहले, मूल्यों को जानो

स्थिति को भी समझना है, और मूल्य को भी समझना है। सबसे बड़ा मूल्य, सबसे ऊँचा मूल्य, एक मनुष्य के लिये, यही है। इससे ऊँचा कोई भी मूल्य नहीं है। तो, इससे पहले कि आप ये कहें कि मूल्य स्थिति से विरोध में है, मेरा एक निवेदन है कि कृपया मूल्य को समझें और कृपया स्थिति को भी समझें। फिर उस समझ से, जो कार्य  निकलता है, उसमें ये सोचना नहीं पड़ता कि अब मैं करूँ क्या। “अब मैं करूँ क्या?” फिर जो स्थिति आएगी  तुम एक तात्कालिक प्रतिक्रिया दे पाओगे, उसी समय। उसी समय दे पाओगे, क्योंकि तुम जिन मूल्यों का दावा करते हो, वो मात्र काल्पनिक मूल्य हैं, वास्तविक मूल्य नहीं हैं। तो इसी कारण तुम पाते हो कि स्थिति में तुम्हारे हाथ बंध जाते हैं। तुम्हारे पास शक्ति नहीं रह जाती कुछ कर पाने की।

~आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर
हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)
आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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हर काम के साथ परिणाम की उम्मीद क्यों?

ऐसा मत सोचो कि जीवन ऐसा होना चाहिए। कोई ज़रूरी नहीं है कि ज़िन्दगी ऐसे ही जी जाए कि अभी जो कुछ हो रहा है उसमें तो कोई मज़ा नहीं, और आगे की उम्मीदें पाल रखी हैं। पर तुम्हें तो बताया ही यही गया है कि दुनिया उम्मीद पर चलती है। दुनिया उम्मीद पर नहीं चलती है, दुनिया अभी है। अभी है। उम्मीद पे सिर्फ कल्पनाएँ चलती हैं। उम्मीद क्या है? कल्पना ही है ना? उम्मीद एक कल्पना ही तो है ना कि आगे कुछ हो जाएगा।

तो तुम देखो, कि तुम्हारी सारी अपेक्षाएँ पैदा कहाँ से होती हैं। तुम्हारी सारी अपेक्षाएँ पैदा ही इसीलिए होती हैं, क्योंकि तुम इस क्षण से बुरी तरह से असंतुष्ट हो। जब इस क्षण से कोई संतुष्टि नहीं मिल रही तो तुम आगे के लिए उम्मीदें पालते हो। जो अभी में पूरा पूरा डूबा होगा, उसको वक़्त कहाँ है जो आगे के लिए सोचे?

आचार्य प्रशांत
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तुम्हारा प्रयास ही बाधा है समझने में

मैंने बिलकुल नहीं कहा कि उलझन सुलझाने की कोशिश करो। जितना सुलझाने की कोशिश करोगे, उतना फंसोगे। मैंने कहा, “सिर्फ समझ जाओ।” क्योंकि उसका उपाय तुम कर नहीं सकते हो ना। कर सकते होते तो अब तक कर न लिया होता? वो उलझन है ही इसलिए क्योंकि तुम उसे सुलझा नहीं सकते। और तुम उसे सुलझा  इसीलिए नहीं सकते क्योंकि तुम उसे समझते ही नहीं हो।

गणित के एक सवाल की ही तरह तुम उसे नहीं समझ रहे हो, इसीलिए तुम उसे सुलझा भी नहीं सकते। समझ जाओ, और वही समाधान है। समझना ही समाधान है।

आचार्य प्रशांत
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