श्रद्धाहीन ज्ञान सिर्फ़ तड़प है

ये मंदिर तो आपके मन का हिस्सा है। ये मंदिर तो आपकी पुरानी दुनिया को कायम रखने का तरीका है। आप जैसे हो, आपने मंदिर में वैसा ही देवता बैठा दिया है। जैसा आपका मन, वैसी देवता की मूरत। किसके सामने सर झुका रहे हो? जिस देवता की मूरत के सामने सर झुकाया जा रहा है, वो आदमी का अहंकार ही है, जो उसने, मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया है। कुछ बदला नहीं है, और मंदिर के आने से, कुछ बदल सकता भी नहीं है। ये वैसा ही होगा कि किसी को हल्का होना हो, उसने पांच अलग-अलग तरह के, बोझ उठा रखे हों। और वो कहे, ‘’एक छठा बोझ भी उठा लेना है, उससे शायद मैं हल्का हो जाऊं।’’ छठा बोझ, किसी भी तरह का हो, किसी भी रूप का हो, किसी भी प्रकार का हो, सुन्दर से सुन्दर मूर्ति हो, वो पिछले पांच को हटा नहीं रहा है। पिछले पांच के रूप में, हमारा अभिमान तो जम कर के बैठा ही हुआ है ना? वो तो वैसे के वैसे ही हैं। बल्कि इस छठे की सार्थकता ही हम इसी में जानते हैं, इस छठे को शुभ ही हम तभी कहते हैं, जब पिछले पांच बने रहें। यदि छठे के आने से, पिछले पांच की, हानि होती हो, तो हम छठे को, आग लगा देंगे।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

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भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

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