कुर्बानी माने क्या?

क़ुर्बानी, आहुति या त्याग, यह स्वतः स्फूर्त बोध और और प्रेम की बातें होती हैं, ये सामाजिक नहीं होती हैं। जब प्यार होता है, तब एक रोटी में आधी-आधी रोटी, बाँट ली जाती है, उसको त्याग नहीं बोला जाता। वो प्रेम है और उसी प्रेम का सहज फल है- ‘त्याग।’ उसको त्याग कहना ही नहीं चाहिए, त्याग कहना, ज़रा अपमान सा होगा, वो तो प्रेम है।
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आप सभी आमंत्रित हैं:
‘स्पिरिचुअल हीलिंग’ पर आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में।
दिनांक:26.10.2016
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39,सेक्टर-63, नॉएडा
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

सुरति माने क्या?

कोई भी विधि तुम्हारी अनुमति के बिना काम नहीं करेगी। विधियाँ दी जा सकती हैं पर विधि को काम करने की अनुमति तो तुम्हें ही देनी है न। तुम मंदिर में बैठे हो पर दिल तुम्हारा अभी अटका ही हुआ है दुकान में और मकान में तो तुमने अपने आप को अभी अनुमति ही नहीं दी है कि यह विधि तुम्हें फायदा दे। विधि की कोई गलती नहीं है। जिन्होंने विधियाँ बनाई उन्होंने ठीक-ठाक बनाईं पर विधि तुम पर काम करे कैसे? और अगर तुम पूर्ण अनुमति दे दो तो फिर विधि की ज़रूरत भी नहीं है। अनुमति जितनी खुली होती जाएगी विधि की आवश्यकता उतनी कम होती जाएगी।

हम इस पृथ्वी पर क्यों आए हैं ?

समझ तुम्हारी ‘अपनी’ है।

जब उसको तुम ‘अपना’ जानते हो, तो जो बाहर की बेकार की चीजें हैं,
जो ज़िंदगी को भरे रहती हैं, जो बहुत समय ख़राब करती हैं, जो बहुत सारी ऊर्जा ले जाती हैं,
उन सब से मोह छूटता है।

फ़िर ज़िंदगी में गर्मी आती है, ऊर्जा आती है,
श्रेष्ठता आती है।

अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है?

बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है ।

यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।

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