हर आदर्श संकुचित करता है

आदर्श की जगह, मैं तुम्हें एक दूसरा शब्द दे रहा हूँ: दर्शन। मूलधातु दोनों शब्दों की एक ही है, आदर्श की और दर्शन की धातु एक ही है पर मैं तुमसे कह रहा हूँ : दर्शन। दर्शन का अर्थ है जानना। जानना, देख पाना। साफ़-साफ़ देखो और तुम्हें उधार की आंखें लेने की ज़रूरत नहीं है, अपनी आँखों से देखो न! तुम सीखना ही चाहते हो अगर, तो अस्तित्व में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे सीखा नहीं जा सकता। यदि आदर्श बनाने का पूरा उद्देश्य ही तुम्हारा यही है कि, ‘’मैं उस आदर्श से कुछ सीखूँगा,’’ तो सीखने के लिए तो पूरा अस्तित्व खुला हुआ है।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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निजता वो अदृश्य रौशनी है जो सब कुछ दिखाती है

निजता यही है कि उसको जान लिया जो मेरा नहीं है। ये जानना ही निजी है। अविभक्तता यही है कि उसको जान लिया जो बाहर से आया है, ये जानना ही सब कुछ है। ध्यान रखिएगा लेकिन कि ये जानना, विचार करना नहीं है। इस जानने का अर्थ नहीं है कि आपने विचार करना शुरू कर दिया कि “मैं ‘मैं’ हूँ, मैं समझ हूँ, मैं बोध हूँ, मैं इंटेलिजेंस हूँ।” ये विचार नहीं है, ये कोई भाव नहीं है, ये कोई इन्ट्यूशन नहीं है। ये सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, इसका होना न होने के बराबर है। ये आपके जीवन की एक एक तस्वीर को रंग देगा, लेकिन खुद कभी नजर नहीं आएगा। ये रौशनी की तरह है, जो सब कुछ दिखाती है पर खुद कभी नज़र नहीं आती।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998

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सम्पूर्ण अकेलापन

आप जो कुछ भी कर रहे हैं, जैसे भी जी रहे हैं, उसमें क्या आपको कुछ भी ऐसा मिला है, जिस पर पराएपन की छाया न हो? या यह पूछ लीजिये अपनेआप से कि, “क्या मुझे संपूर्ण अकेलेपन का एक भी क्षण उपलब्ध होता है?” वही आपका अपना होता है। सुन्दर, पूर्ण अकेलापन। और वो अकेलापन जगत से भागने वाला नहीं होता है, वो अकेलापन आपकी अपनी पूर्णता का एहसास होता है। जहाँ भी दूसरा मौजूद है, वहीँ आपकी अपूर्णता मौजूद है। नहीं तो दूसरे के लिए जगह कैसे बनती।

और यदि मन और विचारों की भाषा में बात करनी हो, तो पूछ लीजिए अपने आप से कि, “क्या दिन भर में कोई भी क्षण ऐसा उपलब्ध होता है, जब मन पर विचार हावी न हों?” आप कहेंगे, “विचारों का आना-जाना तो चलता ही रहता है, प्रवाह है”। तो मैं कहूँगा, “ठीक, विचारों का आना-जाना तो चलता रहे, तो इतना ही बता दीजिए कि ज़रा भी अवकाश आपको ऐसा उपलब्ध होता है, जब आप विचारों से अनछुए रहें। ठीक, विचारों का आना-जाना चलता रहता है। क्या कभी ऐसा होता है कि आप विचारों से अनछुए रहें?”

क्या सत्य सबके लिए अलग-अलग होता है?

जो सत्य एक भी नहीं है, वो दो और पाँच, अट्ठारह कैसे हो सकता है? बड़ी तकलीफ होती है मन को, ‘ऐसी कौन-सी चीज़ है जिसके बारे में हम सोच ही नहीं सकते?’ चीज़ नहीं है दिक्कत यही है जिन्दगी में चीजें इतनी भरी हुई है, जिंदगी में विचार और वासनाएं इतने भरे हुए है, कि चीज के पार भी कुछ हो सकता है, यह ख्याल ही बड़ी तकलीफ दे जाता है, क्योंकि ”चीज़ के पार भी कुछ है तो हासिल तो हम कर नहीं पाएँगे|”
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जब मन रौशन हुआ तब दीवाली जानो

अँधेरे के पास अँधेरे के तर्क होते हैं। रौशनी की तरफ बढ़ने का कोई तर्क नहीं होता है। रौशनी की तरफ बढ़ने का यही मतलब होता है कि अँधेरे की जो जंज़ीरें थीं, अँधेरे के जो तर्क थे, अँधेरे के जो एजेंट थे, जो दूत थे उनको कीमत देना छोड़ा। त्यौहार का मतलब ही यही है कि सत्य को और सत्य कोई बाहरी बात नहीं है, आप जानते हैं सत्य को; त्यौहार का मतलब ही यही है कि सत्य को कीमत दी। इधर-उधर के प्रभावों से हमेशा दबे रहे थे, अब उन प्रभावों से बचे। अँधेरे की जंजीरों को, अँधेरे के षड़यंत्र को काट डाला।
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