स्रोत की तरफ़ बढ़ो

सिर को झुकाकर बिल्कुल ऐसे हाथ खोल दो।
आँचल फैला दो, (हाथ खोलते हुए) ठीक ऐसे।
सिर को झुकाकर ग्रहण करो। और उसके बाद फिर कोई कंजूसी नहीं।
दिल खोलकर बाँटो, भले ही उसमें तुम्हें गालियाँ मिलती हों, भले उसमें कोई चोट देता हो –
यही मज़ा है जीने का। जीना इसी का नाम है।

मुफ़्त का लेते हैं, और मुफ़्त में बाँटते हैं – यही हमारा व्यापार है। यही धंधा है हमारा।
क्या धंधा है? मुफ़्त में लो! मुफ़्त में मिलता है।
‘वो’ तुमसे कोई कीमत माँगता ही नहीं।
एक बार तुमने सिर झुका दिया, उसके बाद ‘वो’ कोई क़ीमत नहीं माँगता।
कीमत यही है कि सिर झुकाना पडे़गा। इसके अलावा कोई कीमत माँगता ही नहीं, मुफ़्त में मिलेगा सब।

प्रेम – मीठे-कड़वे के परे

जानते हो लोग दुखी क्यों हैं? इसलिए नहीं कि दुःख आवश्यक है, इसलिए क्योंकि उन्हें सुख की तलाश है| सुख की तलाश, दुःख को स्थाई बना देती है| जो सुख को पकड़ता है, वो दुःख को भी पकड़ लेता है|

खोजना है खोना, ठहरना है पाना

मन भटक रहा है, और मन व्यापारी प्रकृति का है। वो ये सोचता है कि जो मिलता है, वो लेन-देन से मिलता है। बंजारे यही करते हैं, अदला-बदली, लेन-देन। लेन-देन से आशय यह है कि मैं हमेशा बना रहूं। कुछ दूंगा, तो बदले में कुछ लूंगा भी, ताकि मेरा होना घटे न। और संसार का यही क़ायदा भी है, यहां जो है, वो सिर्फ़ व्यापार है।

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