प्रत्येक कृत्य में जोश रहे

तुम किसी ख़ास कृत्य में उतकृष्ट नहीं होते। जीवन या तो उतकृष्ट होता है या तो सूना-सूना। इस चक्कर में मत पड़ो कि मुझे ये नहीं, ये मिलेगा, तब जाकर के मेरे जीवन में रौशनी आएगी। मुझे कुछ ख़ास करने को मिले, तब मैं उसमें चमक पाऊंगा।
जहाँ हो जो कर रहे हो, उसी में डूबो और फिर वहाँ से हज़ार रास्ते खुलेंगे। हज़ार रास्ते खुलेंगे।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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मन ही का विस्तार है संसार

हिमालय का होना और आप में स्पर्श की शक्ति का होना, एक ही बात है। और ऐसे प्राणी बिलकुल हैं और हो सकते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ आपसे हट कर हों। जिनके न आँख हो न कान हों, आप उन्हें जीवित नहीं मानोगे। आप कह दोगे जीवित ही नहीं हैं। क्यूँकी आपके लिए जीवन का अर्थ है ऐसे प्राणी, जिनमें इस प्रकार की इन्द्रियाँ हों। अरे! इसके पास वही सब इन्द्रियाँ हैं; कान भी हैं, आँख भी हैं, तो आप इसे जीवित मान लेते हो। आप पत्थर को जीवित नहीं मानते। बहुत दिनों तक पेड़ों को जीवित नहीं माना जाता था।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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सुनो ऐसे कि समय थम जाए

अपनेआप को जबतक वो जानोगे जिसने जन्म लिया, किसने जन्म लिया? देह ने, तब तक लगातार मौत के खौफ में जीओगे क्योंकि जिस शरीर ने जन्म लिया है अगर वो हो तुम, तो वो तो जाएगा। आपको ताज्जुब होता होगा कि क्यों सारे शास्त्र, क्यों सारे संत बार-बार अमरता की बात करते हैं, क्योंकि सत्य है ही अमर; क्योंकि जिसको हम ज़िन्दगी कहते हैं उसका ज़हर ही है मौत का खौफ। हमारे सारे खौफ मूलतः मौत का खौफ हैं। और वो जब तक नहीं जा सकता जब तक आप शरीर से जुड़े हुए हो।

जो शरीर से जितना जुड़ा हुआ है उसको मौत का खौफ उतना ज़्यादा रहेगा।

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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया:
http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan
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साधना के बाह्य प्रतीकों का आंतरिक अर्थ

संतों का काम हमेशा यही रहता है कि—तुम्हें बताएं कि तुम जो सोच रहे हो, जिस चीज़ को तुमने पकड़ रखा है वो प्राथमिक नहीं है। तुम किसी हल्की चीज़ को पकड़ कर के बैठे हो और असली को चूकते जा रहे हो।
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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Spirituality on Streets
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When do you call someone as Spiritual?
Is Spirituality about reading scriptures and gaining knowledge?
Or it is about practicing Meditation techniques?
Have you ever seen a Spiritual man fighting on the streets? Let’s learn the Real Essence of being Spiritual!
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Discourse by Acharya Prashant
Day and Date: Sunday, 28th August 2016.
Venue: Maharishi Ramana Kendra, 8 Institutional Area,
Near Sai Mandir, Lodhi Road, Delhi
Time: 11:00 a.m.

ज्ञान इकट्ठा करके नहीं जान पाओगे

जो राह पर चलना ही न चाहता हो, उसके लिए रूमी किसी काम के नहीं।

जिसको अपने घर की चार दीवारों में ही बहुत सुकून मिलता हो, वह दुनिया भर का मान चित्र ले कर बैठा है ‘वर्ल्ड मैप’, तो उसे क्या मिल जाएगा उस मैप से? आप कह रहे हो “ठण्ड बहुत है और यहाँ बड़ा सुकून है, गरमा गर्म।” और हाथ में क्या है आपके? पूरे ब्रह्माण्ड का मान चित्र है। “यहाँ यह है, यहाँ यह है। उधर सत्य के द्वार हैं। आकाश गंगाओं के पार मुक्ति की उड़ान है।”

और तय क्या कर रखा है? कि बैठना इसी चार दीवारी में है, और हाथ में ले के बैठे हुए हो दुनिया का नक्षा।

काहे हो?

काहे को?

आध्यात्मिक प्रतीक सत्य की ओर इशारा भर हैं

बहुत साधारण सी बात है ये, कि उसी में सब कुछ है, और उसके बाहर कुछ नहीं है। जो इस बात को बूझ जाए, वो सब कुछ जान गया।

संतों ने तो बहुत सरल बातें कही हैं। कुछ उन्होंने कभी टेढ़ा-टपरा करा ही नहीं। टेढ़ा-टपरा आदमी का मन कर देता है उसको।

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