कोरोना वाइरस, भगवान, और धर्म || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रेम, दूसरे का कल्याण, परहित, ये सब तो पदार्थ नहीं होते न, भौतिक नहीं होते न।

इसका मतलब कुछ है ऐसा जो भौतिक नहीं है।

वो जो शरीर से आगे है, वो जो पदार्थ नहीं है, उसी को खोजने का नाम, उसी के अनुसंधान का नाम ‘धर्म’ है।

और वही चीज़ जो शरीर से आगे की है, जब नहीं मिलती तो आदमी सदा बेचैन रहता है।

केसरी फ़िल्म, कैसे और बेहतर हो सकती थी?|| आचार्य प्रशांत (2019)

वीरता मूलतः आध्यात्मिक ही होती है।

वीरता कोई अहंकार की बात नहीं होती कि – लड़ जाएँगे, भिड़ जाएँगे, मर जाएँगे।

न।

अहंकार पर आधारित जो वीरता होती है वो बड़ी उथली होती है, थोड़ी दूर चलती है फ़िर गिर जाती है।

ऐसी वीरता जो शहादत को चुनने ले, वो तो आध्यात्मिक ही होगी।  

पढ़ाई के किसी विषय में रुचि न हो तो? || आचार्य प्रशांत (2019)

इंटरेस्ट या रुचि छोटी चीज़ होती है, सत्यता बड़ी चीज़ होती है।

अहंकार कहता है, “रुचि को प्रधानता दो।”

अध्यात्म कहता है, “धर्म प्रधान है।”

अध्यात्म का अर्थ ही है – रुचि की परवाह ही न करना, और उस तरफ़ चलना जिस तरफ़ धर्म है, जिधर सत्य है।

सम्यक क्रोध || आचार्य प्रशांत (2019)

तो कहाँ से आ रहा है तुम्हारा क्रोध – स्वयं की रक्षा के लिए आ रहा है, या धर्म की रक्षा के लिएआ रहा है?

और धर्म की तुमने परिभाषा क्या बना ली  है?

धर्म माने – अपनी धारणाओं और अपने स्वार्थों की परिपूर्ति?

या,धर्म माने – अहम का विसर्जन?

किसी बहुत बड़ी चीज़ के साथ व्यस्त हो जाओ || आचार्य प्रशांत (2018)

गुस्सा आना कोई बुरी बात नहीं है, गुस्से के पीछे कारण सही रखो।

जब लगता है कि कुछ मिल नहीं रहा है, जब लगता है कि कुछ खो रहा है, किसी लक्ष्य को चाहा था और उसकी प्राप्ति नहीं हो रही, तो गुस्सा उठता है।

गुस्से की बात छोड़ो, गुस्से के नीचे वो लक्ष्य है, वो इच्छा, कामना है, जिससे जुड़े हुए हो।

लक्ष्य ठीक रखो।

जो ऊँचे से ऊँचा चाह सकते हो, उसको चाहो।

फिर वो न मिले, और गुस्सा आ गया, तो कोई बात नहीं।

दिक्क़त तब है जब व्यर्थ, छोटी चीज़ चाही, और फिर वो चीज़ नहीं मिली तो गुस्सा किया।

युद्ध का अर्थ क्या? || आचार्य प्रशांत (2018)

और तुम देखना इन दोनों कामों को हमेशा एक साथ ही पाओगे।

जो सिर झुकाना जानता है, उसकी तलवार में बहुत धार होती है, उससे बच के रहना।

और जिसकी तलवार में धार है, भीतर-भीतर उसने सिर झुका रखा है।

और जिसको तुम पाओ कि उसका सच्चाई के सामने सिर नहीं झुकता, उसको जान लेना कि इसको फूँक मारेंगे और ये उड़ जाएगा।

इसमें कोई दम नहीं है, ये लड़ नहीं पाएगा।

इसीलिए शिष्यों ने, या भक्तों ने जब लड़ाईयाँ लड़ीं हैं, तो उनको हराना बहुत मुश्किल हो गया है।

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