अपने निर्णय खुद क्यों नहीं ले पाता?

जीवन में अपना कुछ भी है कहाँ?

जब जीवन में कुछ भी अपना होता है तो फ़िर डर नहीं रह जाता।
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श्री प्रशांत ‘मिथक भंजन यात्रा’ का दूसरा चरण धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में आरम्भ कर रहे हैं।

25 अप्रैल से।

कृपया अपनी जगह आरक्षित कर लें।

खुद को क्यों नहीं जानता?

पूरी भीड़ एक तरफ़ को चल देती है, तुम भी साथ चल देते हो।

सब जा रहे हैं मूवी देखने, तुम्हें भी देखनी है। सब अगर क्लास बंक कर रहें हैं, तो तुम्हें भी करनी है। सब किसी एक चीज़ की तैयारी कर रहे हैं, तुम्हें भी करनी है।

तुम कभी ठीक-ठीक अपने आप से पूछते हो कि मैं क्यों करूँ?
मैं ऐसे जी क्यों रहा हूँ?

मैं क्यों ऐसे जी रहा हूँ?

इसी का नाम है खुद को जानना, और कोई तरीका नहीं है खुद को जानने का।

स्वधर्म क्या है?

रूमी ने कहा है ना, “अपनेआप को साफ़ करो अपने ही पानी से”। गलो और तुम जब गलोगे तो उसी गलने में तुम्हारी सफाई है । जैसे कोई गन्दा स्नोबॉल हो, और वह पिघलता जा रहा हो और उसके पिघलने के कारण ही वह साफ़ होता जा रहा हो । तो देखो कि तुम क्या-क्या हो गये हो ? उसी से तुम स्वधर्म जान जाओगे । जो तुमने इकठ्ठा कर लिया है, जो भी तुम अपनेआप को समझते हो, वही बोझ है तुम्हारा । और तुम्हारा धर्म है ‘बोझ से मुक्ति’ । तुम्हारा धर्म है वापस लौटना । समझ रहे हो ?

फूल-मूल की अभिव्यक्ति

आप जो कुछ भी कर रहे हैं, जैसे भी जी रहे हैं, उसमें क्या आपको कुछ भी ऐसा मिला है, जिस पर परायेपन की छाया न हो? या यह पूछ लीजिये अपनेआप से कि, “क्या मुझे संपूर्ण अकेलेपन का एक भी क्षण उपलब्ध होता है?” वही आपका अपना होता है। सुन्दर, पूर्ण अकेलापन। और वो अकेलापन जगत से भागने वाला नहीं होता है, वो अकेलापन आपकी अपनी पूर्णता का एहसास होता है। जहाँ भी दूसरा मौजूद है, वहीँ आपकी अपूर्णता मौजूद है। नहीं तो दूसरे के लिए जगह कैसे बनती।

और यदि मन और विचारों की भाषा में बात करनी हो, तो पूछ लीजिये अपने आप से कि, “क्या दिन भर में कोई भी क्षण ऐसा उपलब्ध होता है, जब मन पर विचार हावी न हों?” आप कहेंगे, “विचारों का आना-जाना तो चलता ही रहता है, प्रवाह है”। तो मैं कहूँगा, “ठीक, विचारों का आना-जाना तो चलता रहे, तो इतना ही बता दीजिये कि ज़रा भी अवकाश आपको ऐसा उपलब्ध होता है, जब आप विचारों से अनछुए रहें। ठीक, विचारों का आना-जाना चलता रहता है। क्या कभी ऐसा होता है कि आप विचारों से अनछुए रहें?”

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