शास्त्रों को अक़्ल से नहीं पढ़ते

डर क्या है? ये विचार की मेरा कुछ खो सकता है, मैं किसी पर आश्रित हूँ, जिस पर आश्रित हूँ वो मेरा कुछ छीन सकता है| तुम्हारा होना ही दूसरे पर आश्रित है, तुम हो ही इसीलिए क्योंकि दूसरा है, तुम उसी दिन तक हो ना जिस दिन तक दुनिया है| कोई है यहाँ पर जो ये दावा करे की दुनिया मिट जायगी फिर भी मैं रहूँगा? दुनिया मिट गयी है और तुम टंगे हुए हो, खड़े हो कहीं पर, ऐसा हो सकता है? आश्रित हो न पूरे तरीके से दुनिया पर ?

आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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अपनी बात तो तब करें जब कोई दूसरा नज़र आये

विचार के तल होते हैं: निम्न्तम तल पर आप कहते हो, ‘मैं भाई हूँ, पिता हूँ, बन्धु हूँ, कर्ता हूँ’, उच्च्तम तल पर आप कहते हो, ‘मैं ब्रह्म हूँ, शून्य हूँ’। अष्टावक्र कह रहे हैं कि उच्चतम तल पर भी तुम्हारा ‘मैं’ भाव अभी बाकी रहता है। अष्टावक्र परम मुक्ति की बात कर रहे हैं, कहते हैं, कि मैं तो ये भी नहीं कह सकता कि ‘ब्रह्म हूँ’। जो उपनिषदों की परम घोषणा है, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’, अष्टावक्र ने उसको भी मज़ाक बना दिया है।