अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है?

बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है ।

यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।

मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट

मन ऐसा न रखो कि वह लगातार कहीं पहुँचने की इच्छा रखता हो,
जिसके भीतर महत्वकांक्षाएँ भरी हुई हों।

जिस पर जब इधर-उधर से आक्रमण होते हों,
विषयों के, वासनाओं के, इच्छाओं, कामनाओं के, दृश्यों के, ध्वनियों के,
तो वो जो जल्दी से बहक जाता हो।

बाहरी बदलाव क्यों ज़रूरी हैं?

हम जैसा जीवन जी रहे हैं, वैसा ही जीते रहें, और साथ ही साथ, उलझनों से मुक्त हो जाएँ, सत्य के समीप भी आ जाएँ, जीवन को समझ जाएँ, मूर्ख जैसे न रह जाएँ, बोध हममें जगे – ये असंभव है ।

जो अपने जीवन को बाहर से बदलने से रोकेगा, उसका आतंरिक विकास भी बाधित हो जाएगा ।

~श्री प्रशांत

मैं लड़कियों से बात क्यों नहीं कर पाता?

ऐसे लोगों से बचना जिन्हें आँख बचा कर बात करने की आदत हो। और बहुत हैं ऐसे। ऐसे क्षणों से भी बचना जिसमें सहज भाव से, निर्मल भाव से, सरल होकर, निर्दोष होकर किसी को देख ना पाओ। ऐसे क्षणों से भी बचना।

एक नज़र होती है जो समर्पण में झुकती है, प्यारी है वो नज़र। और एक नज़र होती है जो ग्लानि में और अपराध की तैयारी में झुकती है, उस नज़र से बचना।

श्रद्धाहीन रिश्ते

जो संबंध उपजा ही बीमारी से है वो स्वास्थय कैसे दे सकता है आपको? जो व्यक्ति आपके जीवन में आया ही प्रपंचवश है, वो प्रेम कैसे दे सकता है आपको?
प्रेम पूर्णता से उठता है, प्रपंच से नहीं।

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