उदासी और दुख से मुक्ति कैसे हो? || आचार्य प्रशांत (2018)

तुम्हारा अपना दिल जब तक टूटा नहीं, तुम दूसरों के क्या काम आओगे।  

वेदना का अनुभव होना चाहिये।

तुम्हारी अपनी वेदना को संवेदना बन जाना चाहिये।

और जिसके हृदय में संवेदना उठने लगी, समस्त विद्या उसको उपलब्ध हो जाती है।  

अब वो ज्ञानी हुआ।  

मुक्ति रोने से नहीं मिलती || आचार्य प्रशांत (2019)

भावनाओं का आवेग यदि बल है, तो ज्ञान उस बल को सही दिशा देता है। इसीलिये शास्त्रों का अध्ययन ज़रूरी है।

ताकि तुम्हारे भीतर की इस बेचैन ऊर्जा को सही दिशा दी जा सके।

सही दिशा नहीं दोगे, तो भीतर की बेचैनी तुम्हें ही खा जायेगी।

बुरे की क्या परिभाषा है तुम्हारी? ||आचार्य प्रशांत (2016)

जब आनंद आता है, तो उसका रुप कष्ट का होता है।

नतीजा ये होता है कि हम उसे ठुकरा देते हैं। जब मुक्ति आती है तो अपने साथ बंधनों को तोड़ती है। बंधनों को हमने नाम दे रखा है ‘जीवन’ का। मुक्ति आती है तो जीवन टूटता-सा प्रतीत होता है। अब टूट-वूट कुछ नहीं रहा है, कुछ बिगड़ नहीं रहा है, कुछ बुरा नहीं हो रहा है, जो हो रहा है बहुत सुंदर हो रहा है।

कभी पलट के प्रश्न तो कीजिए ‘मुझे कैसे पता कि अब जो हो रहा है वो गलत ही है?’

निश्चितरूप से अपने जीवन को दूसरों की दृष्टि से देख रहे हो।

कहते हैं कबीर ‘जो घर ज़ारे आपना वो चले हमारे साथ’, अब घर जल रहा है कबीर साहब का, घर प्रतीक है वैसे ही समझिएगा, घर जल रहा है कबीर साहब का, कबीर साहब हँस सकते हैं, पड़ोसी क्या कहेंगे?

बेचारा अभागा!

अब अगर पड़ोसियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हुए हो तो तुम्हें भी यही लगने लग सकता है कि तुम अभागे हो क्योंकि जब घर जलेगा तो पड़ोसी तो यही कहेंगे, ‘बेचारा अभागा!’

और तुम्हें भी लगेगा कि कुछ बिगड़ गया। जो कबीर है उसे फिर पूर्णतया कबीर हो जाना चाहिए। अधूरा कबीर होना वैसा ही है, जैसा घोड़े से अधूरा उतरना। वहाँ नाहक कष्ट है, या तो पूरे रहो या फिर तुम घोड़े पर ही बैठे रहो।

घोड़ा खुद हीं थोड़े देर में (गिरा देगा)।

जो उतर रहे हों उनसे यही निवेदन है कि पूरा उतरें।

दुःख को ध्यानपूर्वक देखने का क्या अर्थ है? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2013)

दुःख का असर तुम पर होता है, लेकिन तुम्हारा एक कोना ऐसा है जहाँ दुःख नहीं पहुँच सकता। उस कोने को याद रखो बस। कुछ भी तुम्हारे साथ ऐसा कभी-भी नहीं होता है, जो तुम्हारे मन को पूरी तरह ही घेर ले। एक छोटा-सा बिंदु होता है तुम्हारा जो बच जाता है, उस बिंदु को याद रखो। तो जब दुःख आए, तो तुमसे यह नहीं कहा जा रहा है कि दुःख महसूस मत करो, लेकिन पूरे तरीके से दुःख ही मत बन जाओ। उस दुःख को आने दो।

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