जो जानता हूँ उस पर अमल क्यों नहीं कर पाता?

अपने ही नकली चेहरे के प्रति विद्रोह कर पाना ज़रूरी तो बहुत होता है, पर ज़बरदस्ती नहीं हो सकता।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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कहानी तीन हाथों वाले बन्दर की

मैं तुम्हें कुछ नया नहीं दे पाऊँगा, हाँ, जो तुम्हारे पास है, दोहरा रहा हूँ,उसको हटा सकता हूँ, तुम्हारी बीमारियों को हटा सकता हूँ। स्वास्थ्य नहीं दे सकता, स्वास्थ्य तुम्हारा अपना है और पूरा है। मात्र कल्पना ही करके देख लो कि कैसा होगा वो दिन, जब तुम्हें कहीं पहुँचने की जल्दी, कुछ पा लेने की ख्वाइश हो ही न। ऐसा लगे, जैसे जितनी ख्वाहिशें थी, वो सब पूरी हो ही गयी हैं, इतनी पूरी हुई हैं कि अब कोई ख्वाहिश बची नहीं। कैसा होगा वो दिन? और अगर उसकी कल्पना ही इतनी मधुर है, तो वो दिन कैसा होगा? जिसकी सिर्फ कल्पना ही इतना संतोष देती है तो दिन कैसा होगा? लेकिन वो दिन दौड़ भाग करके नहीं आएगा, वो दिन चेष्टाएँ करके नहीं आएगा। वो दिन थम करके आएगा, वो दिन ज्ञान में आँख खोल करके आएगा, समझ करके आएगा।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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बाहर देख-देख खुद को भूल ही जाते हो

बचपन से तुम जो भी करो दूसरों को ध्यान में रख के ही करो। तो फिर एक स्तिथि ऐसी आ जाती है जहाँ पर तुम्हारे लिए असंभव हो जाता है कुछ भी अपने लिए कर पाना। तुम्हारे पास वो आँख ही नहीं बचती जो अकेला कुछ कर सके। तुम पागल हो जाओगे अगर तुमसे कहा जाए कि तुम कोई काम करो जो सिर्फ तुम्हारे लिए है और तुम्हें दूसरों से कोई मतलब नहीं रखना। तुम पागल हो जाओगे। तुम खाली हो जाओगे बिलकुल तुमसे कुछ निकलेगा ही नहीं। तुम्हारा जैसे स्रोत ही बंद हो गया हो।
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‘अप्प दीपो भव’ के विकृत अर्थ

तुम कहते हो, “देखिए हमें हमारे मन की करने की आज़ादी नहीं दी जा रही है, हमारे ऊपर एक बाहरी व्यवस्था लादी जा रही है। हम क्यों माने किसी की बात? हम क्यों चले किसी और के दिये नियम-कानूनों पर? हमें हमारी करने दो ना।” तुमने कभी गौर किया है कि तुम जिसे कहते हो कि तुम्हारी करने दो, वो है क्या? उसमें तुम्हारा है कितना? तुम कहते हो “नहीं नहीं मुझे मेरे मुताबिक़ नौकरी करने दो, मुझे मत बताओ कि क्या सही, क्या गलत।” ठीक है नहीं बताएंगे, पर तुम यह बता दो कि अगर तुमको सामाजिक पट्टी न पढ़ाई होती, तो तुम्हें यह पता भी होता कि नौकरी जैसी कोई चीज़ होती है? और यदि तुम किसी दूसरे समाज में होते जहाँ तुम्हें दूसरे तरीके से संस्कारित कर दिया होता, तो क्या तुम इसी तरीके से और इन्हीं नौकरियों के पीछे भागते?
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मुझे क्या पाने की ज़रूरत है?

‘जिनको कुछ ना चाहिए’ का मतलब ये नहीं है की इच्छाएं कहीं मर गई। उनका मतलब ही यही है कि इच्छाएं आती-जाती रहेंगी। सारी इच्छाएं जिसको पाने के लिए है, हम उसको जान गए हैं। आपकी कोई भी इच्छा है — आपने कहा ना ख़ुशी के लिए है — हम उस ख़ुशी को जान गए हैं।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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