आप आज जगें , जीवन आज बदले, चुनाव आपको करना है।

आप जो कष्ट झेल रहे हैं, मैं आपसे कह रहा हूँ, “वो आपका प्रारब्ध नहीं है।” आप जो ठोकरें खा रहे हैं, उनमें कोई अनिवार्यता

तुम्हारी प्रकृति है भूल जाना, और है स्वभाव भूलकर भी न भूल पाना

सोच-सोच कर सच तक नहीं पहुँच पाओगे। सोच-सोच कर नहीं समझ पाओगे। सतह पर जमी हुई धूल तुम्हें तुम्हारे केंद्र के माणिक तक नहीं पहुंचा सकती। ठीक उसी तरीके से सतही विचार तुम्हें आत्मा तक नहीं पहुंचा सकता; दुष्चक्र है। विचार जितना इक्ख्ट्टा करते जाओगे, वो विचारों को ही पोषण देगा। विचारक का काम होता है विचार के साथ तादात्म बना देना और, और विचार इकट्ठे करते चलना। ये अलग बात है कि वो विचारों के माध्यम से आत्मा तक पहुँचना चाहता है। रास्ता कैसा भी चुन रहा हो, मंजिल वही है। पर उलटे-पुल्टे रास्तों के साथ मंजिल अगर मिलती भी है तो फिर बड़े कष्ट झेल करके, बड़ा समय लगा करके, बड़ी ठोकरें खा कर के।

~आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

बिखरे मन के लिए संसार में टुकड़े ही टुकड़े

जिसे पहली बात तो यह पता ही नहीं कि सारे प्रतिबिम्ब मेरे हैं, इन सब के स्रोत में मैं बैठा हूँ, मैं अर्थात आत्मा। दूसरी बात जिसे ये पता नहीं कि ये अलग-अलग इसलिए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि मन खंडित है और तीसरी बात जो बड़ी मूर्खता है, वो ये है कि, वो बिना खंडित मन को बदले प्रतिबिम्बों को बदलने की चेष्टा में लगा रहता है। आप, जो मध्य में खड़े हैं वो आत्मा हैं। ये जो टूटे-फूटे हज़ार किस्म के शीशें हैं ये खंडित मन है और उन खंडित मनों में जो परिलक्षित हो रहा है वो संसार है।

संसारी वो, जो मन का खंडन रोके बिना, जो मन का उपचार किए बिना, संसार बदलना चाहता हो।

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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया:
http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan