शरीर का वास्तविक उपयोग

दृष्टि का अर्थ ये नहीं है कि तुमने बादलों को चीर कर के सूरज देख लिया। दृष्टि का अर्थ है कि बादल हैं ही नहीं, कहाँ हैं बादल? मात्र खुला आकाश है और कुछ है नहीं। बात आ रही है समझ में? इसी लिए साधुता, निर्मलता या दृष्टि विशेष होने का नाम नहीं है, वो और ज़्यादा सहज, सामान्य हो जाने का नाम है। उसका अर्थ है कि तुम पीछे आ गए, तुम केंद्र की तरफ आ गए, पीछे घर की तरफ आ गए। जो पूरी यहाँ व्यवस्था थी, स्वरचित, वो टूटी। कुछ नया नहीं आ गया है। साधु उसको मत मान लेना जिसके पास कुछ विशेष है, साधु वो है जिसके पास वो भी नहीं है, जो तुम्हारे पास है। समझो बात को और फिर यही बात उसकी बाहरी व्यवस्था में भी दिखाई देती है। भीतर से भी वो खाली है, उसके पास वो कुछ भी नहीं जो तुम्हारे पास है। तुम्हारे पास क्या है भीतर? तुम्हारे खौफ़ हैं, तुम्हारे सम्बन्ध हैं, तुम्हारे मोह हैं, तुम्हारे आकर्षण हैं, तुम्हारी आसक्तियाँ है। वो भीतर से खाली है, इन सब से और चूँकी वो भीतर से खाली है इन सब से, तो वो बाहर से भी उन सब चीज़ों से खाली हो जाता है जो तुम्हारे पास हैं।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

आध्यात्मिक प्रतीक सत्य की ओर इशारा भर हैं

बहुत साधारण सी बात है ये, कि उसी में सब कुछ है, और उसके बाहर कुछ नहीं है। जो इस बात को बूझ जाए, वो सब कुछ जान गया।

संतों ने तो बहुत सरल बातें कही हैं। कुछ उन्होंने कभी टेढ़ा-टपरा करा ही नहीं। टेढ़ा-टपरा आदमी का मन कर देता है उसको।

प्रेम बेहोशी का सम्बन्ध नहीं

श्रोता: सर मेरा प्रश्न ये है कि किसी को चाहने से हमारी ज़िंदगी इतनी अस्त-व्यस्त क्यों हो जाती है ? असर क्यों पड़ता है हमारे जीवन पर? अक्सर

सुरक्षा नहीं मकान में,लड़की रहो उड़ान में

श्रोता १: सर, आज कल जो परिवारों के मन में डर सा बना हुआ है, हर परिवार में, उस डर को दूर करने के लिए … वक्ता: क्या

भगवान क्या हैं ?

स्वतंत्रता क्या है? हम नहीं जानते। सत्य क्या है? हम नहीं जानते। शिक्षा क्या है? हम ये भी नहीं जानते। मैं कौन हूँ? ये तो बिल्कुल ही नहीं जानते। पर इन सब बातों के बारे में हमने कुछ-कुछ सुन रखा है और इनको मान लिया है। तो इस प्रश्न को अलग से लेकर के नहीं देखा जा सकता कि ‘भगवान् क्या है, सत्य क्या है ?’

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