दुर्बलता को पात्रता कहना ही भिक्षावृत्ति है

जो इंसान खुद भिखारी नहीं होगा, वो दूसरे भिखारियों के लिए भी दया की भावना नहीं रखेगा।
तो यह तो एक आपसी साजिश है, वो तो अपने ही समुदाय के बीच में है। जिसमें हमारा भ्रम है कि एक भिखारी है, और दूसरा दाता है। यह तो भिखारियों की आपसी मण्डली है, जिसमें एक दूसरे को थोड़े बहुत पैसे दिए जा रहे हैं। अभी चौराहे पर देते हैं, फिर गाड़ी लगा कर ऑफिस में जाकर हाथ फैला देंगे। तो कौन भिखारी है और कौन नहीं है?
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मूर्ति द्वार है अमूर्त का

संगति ही सब कुछ है – और मीरा ने कर ली है कृष्ण की संगति। तुम देखो तुमने किसकी संगति करी है?

मन तो प्रभावों के संकलन का नाम है, जैसे माहौल में उसे रखोगे वैसा हो जाएगा; तुम देखलो कि तुमने उसे कैसे माहौल में रखा है?

मीरा को कृष्ण के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था, दिन-रात वो कृष्ण के साथ ही रहती हैं। तुम देखो कि तुम्हारी आँखों के सामने किसका चित्र घूमता है हर समय? सुबह उठते हो तो कौन-से भगवान की शक्ल दिखाई देती है? आँख खोलते हो तो सामने कौन-सी देवी मौज़ूद रहती है?

जिनकी शक्ल दिन-रात देख रहे हो वैसे ही हो जाओगे।

सेवा से पहले स्वयं

स्व ही सब कुछ है | स्व जड़ है और सेवा फूल है | अब समझ में आ रही है बात ? स्व जड़ है और सेवा उस पेड़ का फूल है | सेवा वहीं होगी जिस पेड़ की जड़ें मज़बूत हैं | जो पेड़ स्वस्थ है उसी पर बड़े प्यारे फूल खिलते हैं | बहुत अच्छे फूल आते हैं | पर अगर तुम ये चाहो कि जड़ें तो सड़ी रहें पर फूल तब भी आ जायें, ऐसा हो सकता है क्या ?

स्व मूल है, सेवा फूल है | मूल मतलब जड़; स्व पर ध्यान दो, सेवा अपनेआप हो जायेगी | जो भी कोई तुम्हें बताये सेवा जरुरी है, मदद ज़रुरी है, सहायता, सेवा ज़रुरी है | उनसे कहना ऐसे सेवा नहीं हो सकती | बीमार आदमी सेवा नहीं कर सकता |

जीवहत्या और हिंसा

जहाँ अज्ञान है, वहाँ हिंसा होगी ही होगी। जहाँ हिंसा देखना, समझ लेना कि ये लोग नासमझ हैं। बात नहीं समझते, अज्ञानी हैं। और ये भूलना मत कि हिंसा हज़ारों तरीकों से अभिव्यक्त होती है। सिर्फ खून बहता देखो तो उसे हिंसा मत समझ लेना।

जातिप्रथा बहुत बड़ी हिंसा है। आदमी को जन्म के नाम पर ऊँचा या नीचा सिद्ध कर देना, ये हिंसा नहीं है? बहुत बड़ी हिंसा है। और उसके पीछे क्या है? अज्ञान ही तो है।
दहेज-प्रथा हिंसा नहीं है?
तुम जिस काम के पैसे लेते हो, वो काम ठीक से ना करना हिंसा नहीं है?
पर्यावरण को तुम अपनी गाड़ी के धुएँ से दूषित करते हो, क्या वो हिंसा नहीं है?

संवेदनशीलता, भावुकता नहीं

संवेदना का अर्थ ये नहीं है कि तुमने किसी
को रोते देखा और तुम रोने लग गए। संवेदना अर्थ है कि तुमने किसी को रोते
देखा और तुम जान गए कि उसका जो कष्ट है, वो कितना नकली है। और जब तुम जान
जाते हो कि कष्ट नकली है, तभी तुम उसके कष्ट का उपचार भी कर सकते हो।

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