आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान

‘सम्मान’ का मतलब बस मान लेना नहीं है कि बस मान लिया, आँख बंद करके। फिर तो सिर्फ ‘मान’ भी लिखा जा सकता था, जैसे मान-अपमान होता है ।

‘सम्मान’ का अर्थ है ठीक तरीके से मानना, ठीक तरीके से मानने का अर्थ है पहले जानना-फिर मानना। “जानूँगा तभी मानूँगा”।

माहौल से प्रभावित क्यों हो जाता हूँ?

एक बच्चे के साथ ऐसा होगा और अच्छा है ऐसा हो, कि उसे बाहर से ही प्रभावित होना पड़े, क्योंकि आप एक बच्चे के विवेक पर ये नहीं छोड़ सकते कि ये जो बिजली का सर्किट है, इसमें उंगली डालनी है या नहीं। अगर वो प्रयोग करके सीखेगा, तो शायद शारीरिक रूप से बचेगा ही नहीं। एक बच्चे का प्रभावित होना स्वाभाविक है आठ साल, दस साल, बारह साल की उम्र तक, पर दिक्कत ये है कि तुम अभी तक बारह साल की उम्र के ही रह गए हो।प्रौढ़ता, व्यस्कता तुममें आ ही नहीं रही है।

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