जीवन का अंतिम उद्देश्य क्या है? || आचार्य प्रशांत (2018)

साथ चलना कठिन लग रहा है, साथ छोड़ कर चलना कैसा लगेगा?

तो तुमको ये उम्मीद दे किसने दी कि ज़िन्दगी आसान है? ज़िन्दगी का तो मतलब ही है कठिनाई। आज की रात ये दूसरी-तीसरी बार में बोल रहा हूँ, सही कठिनाई चुनो, सही कष्ट चुनो।

मैं तो बिल्कुल भी ये उम्मीद या दिलासा नहीं देता की मेरे साथ चलोगे तो बड़ी आसानी रहेगी। मेरे साथ चलिगे तो दुविधा रहेगी, द्वंद रहेगा, कठिनाई रहेगी।

हाँ, ये भी देखलो की मेरे साथ नहीं चलोगे तो क्या रहेगा?

आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: भ्रष्ट जीवन का लक्षण है भ्रष्ट भाषा || (२०१२)

जीवन में, आप किसी चीज़ में श्रेष्ठ नहीं हो। तो भाषा में श्रेष्ठ हो जाओगे? जबकि, ‘श्रेष्ठता’ से जीना, जीवन की एक कला है। मैं किसी भी चीज़ में उत्कृष्ट होने की आकांक्षा नहीं करता। तो मैं भाषा में कैसे उत्कृष्टता की आकांक्षा कर लूँ? मेरा तो पूरे जीवन के प्रति रवैया ही यही है कि ‘सब चलता है’। शुद्धि-अशुद्धि ‘सब चलती है’, तो नतीजा — जो ग़लतियाँ मैं पहले करता रहता था, मेरा कोई इरादा ही नहीं है उनको ठीक करने का।

ग़लत भाषा, ग़लत जीवन से पैदा होती है।

~ आचार्य प्रशांत

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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं :-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.comपर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

कुछ पाने के लिए चालाक होना ज़रूरी है क्या? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2014)

क्या वाकई तुम बेहतर काम उसे बोलते हो जिस काम से उसे प्रेम है? ऐसे लोग तुम्हें दिखाई भी पड़ते हैं क्या? तुम बेहतर उसी को बोलते हो जिसने कुछ इकट्ठा कर लिया है। क्योंकि जब हम नंबर की बात कर रहे हैं तो ध्यान देना, तो सिर्फ वही गिना जा सकता है जो इकट्ठा किया गया हो, जो बाहरी है। तुमने कितने पैसे इकट्ठे कर लिए? उसी को तुम गिनोगे। इकट्ठा तुम करना ही तब शुरू करते हो, नंबर के खेल में तुम पड़ना ही तब शुरू करते हो, जब पहले तुम्हारे भीतर ये भावना बैठ जाती है कि मुझे कुछ इकट्ठा करना है। नहीं तो तुम कुछ भी इकट्ठा क्यों करना चाहोगे? कौन है जो कुछ कहेगा मुझे कुछ चाहिए?

जिसको यह लगने लगेगा कि मैं बिल्कुल हीं खाली हूँ, खालीपन आंतरिक है। इकट्ठा तुम बाहर से कर रहे हो, बाहर से तुम जो भी इकट्ठा कर रहे हो, वो उस आंतरिक खालीपन को कभी भर नहीं सकता। तो जो कोई भी तुम्हें इकट्ठा करता हुआ दिख रहा है, उससे दुःखी कोई नहीं हो सकता और तुम उसी राह चलना चाहते हो, ये लोग जो दुनिया में सबसे ज़्यादा कष्ट पाते हैं, पीड़ित हैं, तुम इनका अनुसरण करना चाहते हो?

जीसस की अनोखी कहानी (Jesus: A True Rebel) || आचार्य प्रशांत (2016)

जीसस एक जवान आदमी है। एक साधारण से घर में पैदा हुआ है, पेशे से गरेड़िया है; और वास्तव में जवान है। और एक जवान आदमी की सारी आग मौजूद है उसमें।

उतश्रृंखल, उन्मुक्त घूमता है, छोटी-सी उसकी एक टोली है। इधर-उधर, सड़कों पर घूम-घूम के बजा रहा है लोगों की! जो बात जैसी दिखती है जस-का-तस वैसा बोल देता है। जो भौतिक पार्थिव बाप है उसका, उसको लेकर के बहुत मज़ा नहीं है उसको, इसलिए कह देता है हम तो उसके (परमात्मा) के बेटे हैं।

वो काठ के योद्धा होते हैं जिन्हें डर नहीं लगता || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2014)

डर उठेगा; लेकिन तुम्हें यह फैसला करना है कि डर के आगे घुटने टेक देने हैं या कहना है डर तू बड़ा है, पर तुझसे कही ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ और है, मैं तेरे कारण रुक नहीं सकता।

अगला कदम कहाँ रखें यह साफ-साफ दिख नहीं रहा आपको, कोहरा है, अस्पष्टता है, कुछ पता नहीं चल रहा कि अगला कदम क्या लें, खतरा भी है, गिर सकते हैं, पता नहीं कहाँ कदम रख दिया। लेकिन हम वो खतरा उठायेंगे, हम आगे बढ़ेंगे, गिरने की संभावना है हम तब भी आगे बढ़ेंगे, हो सकता है गिर भी जाएं, गिर जाएंगे तो उठेंगे, फिर भी आगे बढ़ेंगे। और जब ऐसे कर-कर के आगे बढ़ते रहते हो तो फिर धीरे-धीरे मन समझ जाता है कि डर में कुछ रखा नहीं है।

दुःख को ध्यानपूर्वक देखने का क्या अर्थ है? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2013)

दुःख का असर तुम पर होता है, लेकिन तुम्हारा एक कोना ऐसा है जहाँ दुःख नहीं पहुँच सकता। उस कोने को याद रखो बस। कुछ भी तुम्हारे साथ ऐसा कभी-भी नहीं होता है, जो तुम्हारे मन को पूरी तरह ही घेर ले। एक छोटा-सा बिंदु होता है तुम्हारा जो बच जाता है, उस बिंदु को याद रखो। तो जब दुःख आए, तो तुमसे यह नहीं कहा जा रहा है कि दुःख महसूस मत करो, लेकिन पूरे तरीके से दुःख ही मत बन जाओ। उस दुःख को आने दो।

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