मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

शरीर माने मृत्यु

देह धरे का गुन यही, देह देह कछु देह ।  बहुरि न देही पाइए, अबकी देह सो देह ।।  –कबीर  वक्ता: जिसने बोझ उठा रखा

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥ – कबीर वक्ता: एक ही है जो बड़ा है,

एक और आख़िरी मौका

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार । तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ।।  ~ कबीर प्रश्न: संसार में मनुष्य जन्म मुश्किल

संवेदनशीलता, भावुकता नहीं

संवेदना का अर्थ ये नहीं है कि तुमने किसी
को रोते देखा और तुम रोने लग गए। संवेदना अर्थ है कि तुमने किसी को रोते
देखा और तुम जान गए कि उसका जो कष्ट है, वो कितना नकली है। और जब तुम जान
जाते हो कि कष्ट नकली है, तभी तुम उसके कष्ट का उपचार भी कर सकते हो।

हमारा जीवन मात्र वृत्तियों की अभिव्यक्ति

बंदि खलासी भाणै होइ ॥ होरु आखि न सकै कोइ ॥                            

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