स्वधर्म क्या है?

रूमी ने कहा है ना, “अपनेआप को साफ़ करो अपने ही पानी से”। गलो और तुम जब गलोगे तो उसी गलने में तुम्हारी सफाई है । जैसे कोई गन्दा स्नोबॉल हो, और वह पिघलता जा रहा हो और उसके पिघलने के कारण ही वह साफ़ होता जा रहा हो । तो देखो कि तुम क्या-क्या हो गये हो ? उसी से तुम स्वधर्म जान जाओगे । जो तुमने इकठ्ठा कर लिया है, जो भी तुम अपनेआप को समझते हो, वही बोझ है तुम्हारा । और तुम्हारा धर्म है ‘बोझ से मुक्ति’ । तुम्हारा धर्म है वापस लौटना । समझ रहे हो ?

स्वयं का बचाव जीवन से पलायन

पलायन क्या है समझ रहे हो? मैं कुछ हूँ, एक ठोस जमी हुई संरचना। और वो ठोस संरचना, अपने विगलन को एस्केप करना चाहता है। इसलिए एस्केप शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। उसे बदलाव, परिवर्तन, संशोधन, विगलन इन सबसे बचना है।

अब सवाल ये उठता है कि फ़िर एस्केप क्या नहीं है ? फिर क्या है जो एस्केप नहीं है?

ऐसी एक्टिविटी जो तुम्हारे होने से नहीं निकल रही है, बल्कि तुम्हारे होने को ही परिवर्तित कर देगी। जो तुम्हारे होने को ही बदल देगी। तुम जो साधारण खाना खाते हो, वो कैसा होता है? वो, वही होता है जो तुम खाना चाहते हो। तो वो तुम्हारे मानसिक संरचना को बदल नहीं सकता।

भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

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