जीवन का अंतिम उद्देश्य क्या है? || आचार्य प्रशांत (2018)

साथ चलना कठिन लग रहा है, साथ छोड़ कर चलना कैसा लगेगा?

तो तुमको ये उम्मीद दे किसने दी कि ज़िन्दगी आसान है? ज़िन्दगी का तो मतलब ही है कठिनाई। आज की रात ये दूसरी-तीसरी बार में बोल रहा हूँ, सही कठिनाई चुनो, सही कष्ट चुनो।

मैं तो बिल्कुल भी ये उम्मीद या दिलासा नहीं देता की मेरे साथ चलोगे तो बड़ी आसानी रहेगी। मेरे साथ चलिगे तो दुविधा रहेगी, द्वंद रहेगा, कठिनाई रहेगी।

हाँ, ये भी देखलो की मेरे साथ नहीं चलोगे तो क्या रहेगा?

परम लक्ष्य है लक्ष्यहीनता

सबसे बेहतरीन क्षण तुम्हारे वही थे जब तुम आनंदित थे। जब तुम आनंदित थे तब कोई लक्ष्य नहीं था। सारा जीवन अगर वैसा ही बीते, तो बहुत बढिया – आनंदमय। उस आनंदमय होने का अर्थ है – लक्ष्यहीन होना। तो लक्ष्य अधिक से अधिक ये ही हो सकता है कि लक्ष्यहीन हो जाएँ। उस आनंद को पा लें जिसमें लक्ष्य बचते ही नहीं। अब बात समझ में आई? लक्ष्य अगर बनाना है, तो ये बनाओ कि उस आनंद को उपलब्ध हो जाओ। ‘उपलब्ध रहूँ, लगातार रहूँ, प्रतिपल’। तो एक ही लक्ष्य हो सकता है – प्रतिपल आनंदित रहना। और उस आनंद में फिर कोई लक्ष्य नहीं। प्रतिपल मस्त रहना, प्रतिपल पूरे रहना।

बोध और परितोष

सारा जो बोध-साहित्य है, बस वो यही है कि अंततः तुम चाहते ही यही हो कि थम जाऊँ, तो थम ही जाओ ना! दौड़ क्यों रहे हो?

जो जिस कारण भी दौड़ रहा है, क्यों दौड़ रहा है? कि कभी रुक सके|

इसीलिए दौड़ रहा है ना? जब रुकना ही ध्येय है, तो रुक ही क्यों नहीं जाते?

तुम रुक इसीलिए नहीं जाते क्योंकि तुमसे कहा गया है कि ‘रुकना आगे है’| पर जाननेवालों ने तुम्हें ये समझाया है कि आगा-पीछा कुछ होता नहीं| जो है, वो यही है| रुकना है तो तत्क्षण रुको! इसी पल रुको! आगे सिर्फ आशा है और पीछे सिर्फ़ यादें हैं| रुकना या होना बस इसी पल है|

जीत में जीते नहीं, न हार में हारे

जो उचित है, वो करो । नतीज़ा क्या आता है, छोड़ो । क्योंकि कोई भी नतीजा आखिरी कब हुआ है? तो नतीजे को नतीजा कहना ही बड़ी बेवकूफी है । कभी कहीं जाकर के कहानी रूकती हो तो तुम बोलो ‘द एंड’ । जब कहानी कहीं रूकती ही नहीं तुम क्यों कहते हो कि कहानी का नतीजा यह निकला । अनंत कहानी है, तो कैसे पता कि चूक गये?

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