आलस माने क्या?

आलस बड़ी चालाक चीज़ होती है | कोई भी फ़िज़ूल काम करने में तुम्हें कभी आलस नहीं आयेगा | तुमने कभी गौर किया है कि तुम्हें आलस किन कामों में, किन चीजों में आता है?

आलस ऐसा नहीं है कि अँधा है | खूब आँखें हैं उसके पास, बड़ा शातिर है | खूब चुन-चुन के आता है आलस | कभी देखा है तुम्हें आलस किन-किन चीजों में आता है?

आलसी-वालसी नहीं हो तुम | तुम बड़े परिश्रमी हो | जहाँ पर तुम्हारे स्वार्थ सिद्ध हो रहे होते हैं वहाँ तुम्हें कभी आलस नहीं आयेगा | खूब दौड़ लगा लोगे |

जिसने माँगा नहीं उसे मिला है

हम अपनी ही जड़ों को काटते चले हैं| हमें भय है अपने ही विस्तार से|

किसी ने कहा है कि, “हमें किसी से डर नहीं लगता, हमें अपनी ही अपार सम्भावना से डर लगता है|”

कहीं न कहीं हमें पता हैं कि हम अनंत हैं| कहीं न कहीं, हमें पता है कि क्षुद्रता हमारा स्वभाव नहीं| हम अपनेआप से ही डरते हैं, अपनी ही संभावना से बड़ा खौफ़ खाते हैं| अगर हमें हमारी संभावना हासिल हो गयी, तो होगा क्या हमारे छोटे-छोटे गमलों का? हमें उनसे बाहर आना पड़ेगा|

दमित जीवन ही उत्तेजना माँगता है

आपको अच्छे से पता है कि आप सुबह उठ कर कहाँ जाओगे, आपको अच्छे से पता है वहाँ क्या होगा। आपको यह भी पता है कि आप वापस लौट कर कहाँ आओगे। आपको यह भी पता है कि वहाँ आपको कौन-से चेहरे मिलेंगे, आपको यह भी पता है कि वो आपसे किस तरह की बातें करेंगे, आपको यह भी पता है कि उसके बाद क्या होगा, और अगला दिन भी वैसा ही होगा। सब कुछ तो तयशुदा है।

जब सब कुछ इतना तयशुदा हो जाता है, तो मन का एक कोना विद्रोह करता है। वो कहता है, “भले ही मौत का ख़तरा हो, लेकिन कुछ तो अलग हो”।

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

आपके जाने के बाद भूल क्यों जाता हूँ?

जब भी कोई समस्या बहुत बड़ी लगने लगे, तो एक सवाल पूछना अपने आप से? “समस्या बड़ी है या मैं छोटा अनुभव कर रहा हूँ।” ईमानदार उत्तर हमेशा एक ही मिलेगा- समस्या बड़ी नहीं है, तुम अपने आप को बहुत छोटा मानते हो। और छोटा मानने का जो कारण है वो बता दिया है

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