जानने और जानकारी में क्या फ़र्क है?

आप जब उपनिषद् को पढ़ोगे तो यदि आप उपनिषद् के साथ एक हो पाए तो फिर जैसे ही आपका मुँह खुलेगा और आप जो भी बोलोगे वो एक नया उपनिषद् होगा। उपनिषद् आपके सामने है और आप उपनिषद् में तल्लीन हो गए हो, आप एक हो गए हो उपनिषद् से, बिलकुल एक हो गए हो। उस क्षण में आपके मुँह से जो भी निकलेगा वो उपनिषद् है, ये अर्थ है लर्निंग का।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

विश्वास, जानना, लक्ष्य

हमें दुःख क्यों होता है? मुझे क्यों दुःख हो अगर मुझे सच पता हो। अगर एक पागल आदमी मुझे गाली दे रहा है, क्या मुझे दुःख होगा? दुःख होने का तो अर्थ ही यही है कि मुझे संदेह है। तुम आओ और मुझसे मिलो और बोलो मैं गधा हूँ और मेरे चार कान हैं- दो आदमी के और दो गधे के। तुम आओ और मुझसे बोलो सर, आप गधे हो। यह दो के अलावा दो और कान हैं; दो आगे और दो पीछे। मैं दुःखी हो जाऊंगा अगर मेरे मन में शंका पैदा हो जाए कि मैं सच में गधा हूँ, तब मैं जरूर बेचैन हो जाऊंगा। जिसे अपना नहीं पता होगा, जिसको अपने जानने में कमी होगी वही तो दूसरो को जानने में दुःखित होगा ना। जिस बारे में तुम जानते हो, उसी के बारे में संदेह होता हैं।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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दुनिया मुझ पर हावी क्यों हो जाती है?

अगर अच्छे या बेकार का तुम पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा तो ज़्यादातर चीज़ें जो तुम परिणाम के लिए करते हो वो तुम करोगे नहीं। देखो, बदलाव टुकड़ों में नहीं होता। यह कहना बहुत आसान है कि मैं ऐसा हो जाऊँ कि मुझ पर दूसरों के कहे का फ़र्क न पड़े। दूसरे हँसे तो भी मैं वही करता रहूँ जो मैं कर रहा हूँ और दूसरे तारीफ़ करें तो भी मेरे करने में कोई अंतर न आए। लेकिन उसमें एक पेंच है वो यह है कि अगर दूसरे हँसे नहीं या दूसरे तारीफ़ न करें तो तुम वो ज़्यादातर काम करोगे ही नहीं जो तुम करते हो। समझो बात को। तुम कहते हो कि मैं कुछ करता हूँ और उस काम के अंत में मुझमें यह अंतर न पड़े कि लोग क्या कहेंगे। पर तुम पर अगर अंतर न पड़ता होता लोगों का कि क्या कहेंगे तो तुम ये काम करते ही नहीं।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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वृत्तियों का बहाव

हम जो भी रहें हैं वो पूरी तरह से बाहरी रहें हैं इसीलिए इस माहौल को भी हम बाहरी बना लेते हैं। इसको भी हम बस एक माहौल जैसा ही ले लेते हैं और अगर यह माहौल है तो माहौल तो थोड़ी देर में ख़त्म हो जाना है। अगर यह बाहरी चीज़ है, तो जो कुछ भी बाहरी है वो थोड़ी देर में हट जानी है। थोड़ी देर मैं सत्र समाप्त हो जाएगा तो उसके साथ तुम्हारा यह प्रश्न भी समाप्त हो जाएगा कि मैं वृत्तियों के बहाव को जानती हूँ। सत्र के साथ यह जानना उठा था और सत्र के समाप्त होते ही यह जानना समाप्त हो जाएगा।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

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 मन के बहुतक रंग हैं

ऐसे समझो यहाँ पर अगर तुम सोई हुई हो तो कितने भी सवाल पूछे जाते रहें, क्या तुम्हें पता चलेगा कि सवाल पूछे गए? यानि कि पूछने वाला और जानने वाला दो अलग-अलग इकाईयाँ हैं। पूछा जा सकता है बिना जाने कि पूछा गया? स्लीप-वॉकर होते हैं जो रात में नींद में चलते हैं? वो चल लेते हैं बिना जाने कि चला गया। यानि कि चलने वाला और जानने वाला, दो अलग-अलग हैं। तभी तो चला जा सकता है बिना जाने कि मैं चल रहा हूँ। होता है कि नहीं होता है? जान नहीं रहे हो कि चल रहे हो पर रात में चल रहे हो। यानि कि चलने वाला और जानने वाला दोनों अलग अलग हैं, हैं न?
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आचार्य प्रशांत के साथ 26वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है।

दिनांक: 26-29नवम्बर
स्थान: शिवपुरी, ऋषिकेश, उत्तराखंड

आवेदन हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

जब आँखें खुलती हैं तो दुनिया बदल जाती है

परिवर्तन हमेशा पुराने के सन्दर्भ में होता है। परिवर्तन का अर्थ है कि पुराना गायब है और उसमें कोई थोड़ा सा बदलाव आ गया है। अगर मैं कह रहा हूँ कि दुनिया बदल गई तो मेरा अर्थ ये है कि पुराना पूर्णतया ख़त्म हो गया, परिवर्तन नहीं हो गया बल्कि ख़त्म हो गया, बदल गई। इसी कारण से हमें ये जान पाना करीब-करीब असंभव है कि खुली हुई आँखों से जब दुनिया को देखा जाता है तो वो कैसी दिखती है, क्योंकि वो एक परिवर्तित दुनिया नहीं होती है। परिवर्तित दुनिया की तो आप कल्पना कर लोगे। वो आपकी मान्यताओं के आस-पास की ही है तो आप उसकी कल्पना कर लोगे। खुली आँखों से जो दुनिया देखी जाती है वो बिलकुल ही अलग होती है।
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आप सभी आमंत्रित हैं:
‘स्पिरिचुअल हीलिंग’ पर आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र
दिनांक: 26.10.2016
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39, सेक्टर-63, नॉएडा
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

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