हर आदर्श संकुचित करता है

आदर्श की जगह, मैं तुम्हें एक दूसरा शब्द दे रहा हूँ: दर्शन। मूलधातु दोनों शब्दों की एक ही है, आदर्श की और दर्शन की धातु एक ही है पर मैं तुमसे कह रहा हूँ : दर्शन। दर्शन का अर्थ है जानना। जानना, देख पाना। साफ़-साफ़ देखो और तुम्हें उधार की आंखें लेने की ज़रूरत नहीं है, अपनी आँखों से देखो न! तुम सीखना ही चाहते हो अगर, तो अस्तित्व में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे सीखा नहीं जा सकता। यदि आदर्श बनाने का पूरा उद्देश्य ही तुम्हारा यही है कि, ‘’मैं उस आदर्श से कुछ सीखूँगा,’’ तो सीखने के लिए तो पूरा अस्तित्व खुला हुआ है।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

मदद या अहंकार?

जो मदद है, उसमें सूक्ष्म अहंकार रहता है। उसमें ये अहंकार रहता है कि, “मैं मदद कर सकता हूँ” और जब भी तुम ये दावा करोगे कि, ‘’मैं मदद कर सकता हूँ,’’ तो उसमें चोरी-छिपे ही सही, थोड़ा बहुत ही सही, लेकिन ये भाव भी आएगा ही, “मैं श्रेष्ठ हूँ।” मुझमें योग्यता है मदद करने की और ‘मैं’ मदद कर रहा हूँ, ‘मैं’। तो उसमें अहंकार रहेगा ही रहेगा। वो अहंकार इसलिए रहता है क्योंकि अभी तक तुम खुद पूरे तरीके से मुक्त नहीं हुए हो।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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प्रत्येक कृत्य में जोश रहे

तुम किसी ख़ास कृत्य में उतकृष्ट नहीं होते। जीवन या तो उतकृष्ट होता है या तो सूना-सूना। इस चक्कर में मत पड़ो कि मुझे ये नहीं, ये मिलेगा, तब जाकर के मेरे जीवन में रौशनी आएगी। मुझे कुछ ख़ास करने को मिले, तब मैं उसमें चमक पाऊंगा।
जहाँ हो जो कर रहे हो, उसी में डूबो और फिर वहाँ से हज़ार रास्ते खुलेंगे। हज़ार रास्ते खुलेंगे।
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उचित-अनुचित में भेद कैसे करें?

एक जगा हुआ, एक वास्तविक रूप से बुद्धिमान व्यक्ति जो अपनी निजता में जीता है, वो कभी भेड़ नहीं हो सकता। उसे कोई शौक नहीं है कि किसी का आवागमन करने का और ना वो चाहता है कि कोई और उसका अनुगमन करे। वो कहता है ‘’हम सब पूर्ण ही पैदा हुए हैं।’’ गहरी श्रद्धा है उसके जीवन में, कहता है ‘’बोध सबको उपलब्ध हो सकता है। उस परम की रोशनी हम सबको ही मिली हुई है।’’ और यही व्यक्ति फिर मानवता का फूल होता है “दा सॉल्ट ऑफ अर्थ।” उसके रास्ते में अड़चनें आ सकती हैं, उसे पागल घोषित किया जा सकता है क्योंकी जो समाज के अनुसार ना चले, समाज को वो पागल ही लगता है। उसको ख़तरनाक कहा जा सकता है क्योंकि अन्धेरे के लिए वो खतरनाक ही है, रोशनी होकर।लेकिन वो लोग भी, जो उसे खतरनाक घोषित कर रहे होते हैं, जो उसको पागल कह रहें होते हैं, पत्थर मार रहे होते हैं, ज़हर पिला रहे होते हैं, वो भी कहीं ना कहीं उसकी पूजा कर रहे होते हैं। मन ही मन कहते हैं ‘’काश, हम भी ऐसे हो सकते। हाँ, मारना तो पड़ रहा है इसे, पर काश हमें भी इसकी थोड़ी सी सुगन्ध मिल जाती।‘’
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