जो समय में है वो समय बर्बाद कर रहा है

जो समय में नहीं है, उसका समय ख़राब नहीं हो रहा। और जो समय में है, वो समय बर्बाद कर रहा है। जो ठीक अभी मौजूद है, समय में है, वो इस क्षण का ठीक अभी-अभी पूरा-पूरा सदुपयोग कर रहा है। और जो इस क्षण में नहीं है, जो समय में है, अतीत या भविष्य की कल्पनाओं में खोया हुआ है, वही है जो समय ख़राब कर रहा है।
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नए कि आकांक्षा पुराने को कायम रखेगी

जिन्हें वास्तव में नया चाहिए, वो नए कि आकांक्षा न करें। नए कि आकांक्षा पुराने को कायम रखेगी। नए कि आकांक्षा तुरंत नए को एक

अहंकार सीमाएं है

अहंकार जब भी घोषणा करता है, तो अपने सीमित होने की ही करता है। अहंकार की प्रत्येक घोषणा, बस इतनी सी है, ‘’मैं छोटा हूँ। मैं छोटा हूँ और इस बात से डरता हूँ। इस कारण मैं अपने आपको थोड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बता रहा हूँ।’’

अहंकार अपने छोटे-पन का अहसास है। अहंकार अपनी सीमितता का अहसास है।
कृष्ण उस अहसास से ऊपर उठ गए हैं तो इसलिए कृष्ण इस ‘मैं’ शब्द का बड़े निरहंकारी रूप में प्रयोग कर रहे हैं। जब कृष्ण बोलते हैं ‘मैं’, तो फिर कृष्ण नहीं हैं, ‘मैं’। वो समस्त अस्तित्व की बात कर रहे हैं। जो कृष्ण का ‘मैं’ है, यह कोई शरीर में सीमित ‘मैं’ नहीं है। यह वो ‘मैं’ है, जो पूरे अस्तित्व में व्याप्त है, फैला ही हुआ है। धूल-धूल में फैला हुआ है और यह काम एक अहंकारी आदमी नहीं कर सकता।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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पूर्णता मुखर मौन है; तुम्हारी सारी कहानियाँ अपूर्णता की हैं

जब तक भविष्य रहेगा, तब तक हिंसा रहेगी औरआप तब तक अपने केंद्र से ही दुनिया को देखोगे। आप अपने केंद्र से ही अस्तित्व में जो कुछ है ,उसको देखोगे और उसका दोहन करना चाहोगे, शोषण करना चाहोगे। आप कहोगे, ‘’जो कुछ भी है, वो इसलिए है कि मेरे काम आ सके।’’ जंगल क्यों है? ‘’ताकि इसका पैदावार मुझे सुख दे सके।’’ जानवर क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उन्हें खा सकूँ और उनसे श्रम ले सकूँ।’’ दूसरे क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उनका किसी तरीके से इस्तेमाल कर सकूँ।’’ ये अहंकार का केंद्र रहेगा। आपको इस पर बैठना ही पड़ेगा। जब तक भविष्य है, तब तक अहंकार है। जब तक भविष्य है, तब तक हिंसा है।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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गहरी वृत्ति को जानना ही है त्याग

सौ त्याग कर लोगे, माया को कितना भी तज लोगे, माया माने बाहरी माया, ये त्यागा वो त्यागा, पर जब तक मन में जो ग्रंथियां हैं उनको जाना नहीं, त्यागा नहीं, तो बस नशे में भटकते ही रहोगे। बाहरी त्याग से कुछ नहीं होगा, वो आडम्बर बन जाएगा।
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