गॉसिप – व्यर्थ चर्चा- मेरे जीवन का हिस्सा क्यों? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

ज़िंदा तो वो कि जिसके पास होश हो।

ज़िंदा तुम तभी जब तुम होश में हो।

जहाँ होश नहीं, वहाँ ज़िन्दगी कैसी।

हमारे साथ त्रासदी ये हो जाती है कि हम पूरी क्षमता रखते हैं ज़िन्दगी होश में बिताने की, उसके बाद भी बेहोश रहते हैं।

न सामाजिक न पशु

जानते हो हिंदी में पशु को क्या कहा जाता है ? पशु l धातु है पाश और पाश का मतलब है बंधन l जो भी गुलाम है वही पशु है l “मनुष्य एक सामाजिक पशु है” कहने का अर्थ ये हुआ कि मनुष्य को पाश में – दासता में- अनिवार्यतः रहना ही होगा, कि दासता मनुष्य का प्रारब्ध है l

बाहरी प्रेरणा साथ नहीं देती

बाहरी आता है, एक माहौल बनाता है, तुम्हारे मन को बिलकुल आंदोलित कर देता है l उसके रहते मन आंदोलित होता है पर क्या ऐसा उत्साह सदा रह सकता है? प्रभाव जाएगा और उसके साथ तुम्हारा उत्साह भी चला जाता है l

और क्या जीवन हमने ऐसे ही नहीं बिताया है ?

शरीर यन्त्र है, तुम नहीं

क्या तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होता कि सिर दर्द हो रहा है पर तुम कहो कि सिर को दर्द होने दो, हम नहीं रुकेंगे? शरीर को मशीन की भाँति लगे रहने दो। तुम मशीन मत बन जाना।

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