अगर सभी बुद्ध जैसे हो गये तो इस दुनिया का क्या होगा?

तुम्हारा इरादा बस इतना है कि—किसी तरीके से संसार के पार जो है उसकी कल्पना कर लो और कल्पना चूंकि तुम्हारी ही होगी, तो तुम अपनी ही कल्पना में खोट निकाल लोगे और खोट निकाल कर तुम ये सिद्ध कर दो कि अभी जो चल रहा है यही तो ठीक है।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

तुम्हें ज़िन्दगी की पहचान होती तो ऐसे होते तुम?

जैसे ही आप ने कह दिया कि —“मरूं तो हरि के द्वार”— तो आपने ये भी कह दिया कि कुछ द्वार ऐसे भी हैं जो हरी के नहीं हैं, और आपने हरि को सीमित कर दिया। आपने कह दिया कि कुछ दरवाज़े हैं जो हरि के हैं और शायद वो मंदिरों के दरवाज़े होंगे, और बाकी सारे दरवाज़े हरि के नहीं हैं

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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया :
http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

अपनी बेसब्री की वजह जानते हो?

साधु जन कौन है? साधु जन वो है जिसने वहाँ घर बनाया है जहाँ आने-जाने का कोई सवाल नहीं पैदा होता। तुम उसका घर उजाड़ ही नहीं सकते। तुम जितनी बार उसका घर उजाड़ोगे उतनी बार तुम पाओगे कि वो बना ही रखा है, वैसे ही जैसे पानी पर लाठी मारी हो। तुम समुद्र पर लाठियाँ मारोगे तो क्या होगा? कुछ भी नहीं, मारते रहो वो टूटेगा नहीं। “हम वहाँ रहते हैं जहाँ हमारे घर को कोई छू नहीं सकता, खराब नहीं कर सकता।” तुम नहीं भेज पाओगे, कि जा करके इसका घर गिरा दो।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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Spirituality on Streets
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When do you call someone as Spiritual?
Is Spirituality about reading scriptures and gaining knowledge?
Or it is about practicing Meditation techniques?
Have you ever seen a Spiritual man fighting on the streets? Let’s learn the Real Essence of being Spiritual!
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Discourse by Acharya Prashant
Day and Date: Sunday, 28st August 2016.
Venue: Maharishi Ramana Kendra, 8 Institutional Area,
Near Sai Mandir, Lodhi Road, Delhi
Time: 11:00 a.m.

मात्र इन्द्रियाँ ही शरीर व संसार का प्रमाण

आपका पूरा संसार आपके शरीर पर आधारित है, इस बात को ध्यान से समझिएगा, पूरा संसार हमारा हमारे शरीर से शुरू होता है। संसार और शरीर एक ही हैं—दोनों पदार्थ। जगत के सारे विचारों, जगत में जो कुछ भी है उन सब के अर्थ हमारे मन से शुरू होते हैं। संसार में जो कुछ भी भौतिक है, जो कुछ भी पदार्थ है वो हमारे शरीर से शुरू होता है और संसार भर में जो कुछ भी है और उसके जितने भी अर्थ हैं वो हमने अपनी क्या पहचान बना रखी है इससे शुरू होते हैं।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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