असली प्रेमी हो, तो प्रेमिका का अहंकार काटो

कृष्ण तब हुए तुम, जब प्रकृति से एक होने के लिए, प्रकृति को तुम्हें आवृत ना करना पड़े, तब कृष्णत्व है। जब सामने वाले को पूरी तरह जानते हो, और फिर भी वो प्यारा लगे, तो तुम कृष्ण हुए। हमें तो कोई प्यारा लगता ही इसी शर्त पर है, कि उसका कुछ छिपा हुआ हो। नंगा शरीर तुम्हें उतनी उत्तेजना नहीं देता होगा, जितनी अधनंगा देता है। कभी गौर किया है? कृष्ण तुम तब हुए जब तुम्हें सब दिख जाए, पूर्ण नग्न, एक एक तथ्य जान गए जीवन का। सब खुला सा है। आँखें खुली हुई हैं, मन ध्यानरत है। और फिर कहते हो कि अब होगा रास। तब हुए तुम कृष्ण, ऐसे थोड़े ही कि प्रेम करने के लिए भी चीज़ें छुपा रहे हैं ।
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अद्वैत बोध शिविर

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जो तुम्हें अशांत करे, सो गलत

कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं होता। महत्वपूर्ण बस ये होता है कि जो कर रहे हो, वो तुम्हारा चैन न छीन ले। कोई भी काम महत्वपूर्ण या गैर महत्वपूर्ण नहीं होता। हमने कहा था न कि कुछ भी सही और गलत मानो ही मत, चाहे पूरी दुनिया में आग लग जाए, उसको गलत मत मानना। गलत बस एक बात; क्या?
अशांति।
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आत्मा कहाँ है?

दिक्कत क्या हुई है कि दुनिया के सारे धर्म-ग्रन्थ ऐसे लोगों के हाथों में पड़ गए है, जो उनको पढ़ने के अधिकारी ही नहीं थे। उन्होंने उनको न सिर्फ पढ़ा है बल्कि उन पर भाष्य भी लिख दिए हैं। और ये भी दावा कर दिया है कि, ‘’हम विशेषज्ञ हैं, हमसे पूछो कि इनका अर्थ क्या है।’’ तो ज़बरदस्त अनर्थ हुए हैं। हर धर्म में ज़बरदस्त अनर्थ हुए हैं! एक-एक पंक्ति, नाश उसका लगा दिया गया है। बात वो कुछ और इशारा कर रही है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि एक पंक्ति नहीं है जिसका अर्थ वास्तव में लिया जाता हो, जो कहने वाले ने कहना चाहा था। क्योंकि अर्थ आप तभी समझ सकते हो, जब आप वहीं स्थित हो, जाओ जहाँ से वो पंक्ति आ रही है।
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अपनी आदतों के सिवा मैं कुछ और नहीं

आदतें जानते हो आप, जो कुछ भी जानकारी के दायरे में आता है, अतीत से आता है, जो भी आप जानते हो और बार-बार करना चाहते हो, जो बार दोहराना चाहते हो, जिसमें मन को सुरक्षा की भावना मिलती है – वो आदत है। मन कहता है, ‘’मैं एक राह पर चल रहा था पिछले 20 सालों से और मेरा कुछ ख़ास बिगड़ नहीं गया , तो अब मैं इसी राह पर और 20 साल चल लेता हूँ। जब आज तक नहीं कुछ हुआ तो अब क्या होगा’’ – यही आदत है। और मैं हूँ कौन? उससे राह पर चलने वाला।
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सत्य – मूल्यवान नहीं, अमूल्य

मूल्यवान वो, जो बहुत क़ीमती है पर उसकी क़ीमत है, सौ का नहीं है, तो एक लाख का है। पर अमूल्य माने वो जो किसी और आयाम में है, डाईमेंशन ही दूसरा है, उसकी क़ीमत लग ही नहीं सकती, वो गिनती से बाहर है। आप मूल्यवान को ख़ोज रहे हो, इसीलिए आपको फिर मूल्यों की गिनती करनी पड़ती है, जो अभी आप कर रहे हो कि, “एक को पकड़ा, तो दूसरा छूटता है तो फिर गणित का हिसाब-किताब करना पड़ता है कि इसका मूल्य कितना था और उसका मूल्य कितना था?”

अमूल्य, ‘उसको’ जानो, ‘उसका’ मूल्य न कम है, न ज़्यादा है। जब कहा जाता है मूल्यवान, तो आपको ये भ्रम हो जाता है कि “अमूल्य वो, जो मूल्यवान से भी ज्यादा कीमती हो” गलत है धारणा ये। अमूल्य वो, जिसकी कोई क़ीमत नहीं, न कम न ज़्यादा। वो सभी कीमतों से हट कर के है।
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