रस नज़दीकी में हैं

आप गलत जगह पर गलत चीज़ खोज रहे हो। जो रसना कृष्ण से मिलनी है, वो कृष्ण से ही मिलेगी; वो कामना में नहीं मिलेगी। जो रस कृष्ण देंगे, वो रस सिर्फ़ कृष्ण ही दे सकते हैं, कामनाएं नहीं देंगी। जो रस आत्मा से ही बहना है, वो रस आत्मा से ही बहेगा, अहंकार से नहीं बह पाएगा।

तलाश सब को एक ही की है। हम सब एक ही हैं, तो तलाश भी सब को एक ही की है, बस कुछ खोजने निकल पड़े हैं और जो खोजने निकल पड़ता है, वो अपने ही तल पर खोजता रह जाता है। उस तल पर मिलेगा नहीं। तलाश सबको उसी रस की है, जिसका नाम सत्य है। उपनिषद् कहते हैं रसोवई सख, वह रस रूप है। रस का अर्थ होता है सार, एसेंस, जूस कि जैसे बाहर-बाहर दिख रहा हो जो, उसके भीतर की मिठास, उसके भीतर का सत्व, वह ‘वह’ है। वह रस रूप है।
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मूर्ति द्वार है अमूर्त का

संगति ही सब कुछ है – और मीरा ने कर ली है कृष्ण की संगति। तुम देखो तुमने किसकी संगति करी है?

मन तो प्रभावों के संकलन का नाम है, जैसे माहौल में उसे रखोगे वैसा हो जाएगा; तुम देखलो कि तुमने उसे कैसे माहौल में रखा है?

मीरा को कृष्ण के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था, दिन-रात वो कृष्ण के साथ ही रहती हैं। तुम देखो कि तुम्हारी आँखों के सामने किसका चित्र घूमता है हर समय? सुबह उठते हो तो कौन-से भगवान की शक्ल दिखाई देती है? आँख खोलते हो तो सामने कौन-सी देवी मौज़ूद रहती है?

जिनकी शक्ल दिन-रात देख रहे हो वैसे ही हो जाओगे।