अतीत को पीछे कैसे छोड़ें?

आनंद का अर्थ ही होता है, ‘स्वयं से मुक्ति’ !

‘हम’ अपने ऊपर बहुत बड़ा बोझ होते हैं ।

और जब वो बोझ हटता है, तो मस्ती छा जाती है ।

उसको कहते हैं ‘आनंद’ ।

आप जब अपने से ज़्यादा बड़े किसी लक्ष्य को समर्पित हो जाते हैं तो आनंदित हो जाते हैं । आप जब अपनी छोटी-छोटी व्यक्तिगत चिंताओं और आशाओं के पार कुछ देख लेते हैं तो आनंद उठता है । मन को वो आनंद दीजिये, नहीं तो वो छोटे-मोटे सुख के खातिर इधर-उधर भटकता ही रहेगा !

वर्तमान को परखिये ! कैसा जीवन जी रहे हैं? क्या उसमें कुछ ऐसा है जो बहुत बड़ा हो, आनंददायी हो?

अगर है, तो मन नहीं भागेगा । अगर नहीं है तो निश्चित भागेगा ।

~ आचार्य प्रशांत

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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.comपर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

कालातीत योग और समकालीन चुनौतियाँ

चित्त की वृत्ति का निरोध वास्तविक योग है!

जो तुम्हारी आदतें हैं, जो तुम्हारी वृत्तियाँ हैं, उनसे तुम आज़ाद हो जाओ, उनसे तुम्हें मुक्ति मिल जाए, यही मोक्ष है – यही योग है।

तो, हठयोग इसीलिए दिया गया था ताकि तुम वास्तविक योग के दरवाज़े तक पहुँच सको। पर जिसका उपयोग होना चाहिये था वास्तविक योग के तुम्हें दरवाज़े तक पहुँचाने के लिए, आज उसका उपयोग होने लग गया है वास्तविक योग से तुम्हें दूर रखने के लिये। यहाँ तक कि आज हठयोग को ही योग माना जाने लगा है।

अगर कोई आपसे मिले और कहे कि वह योग करता है, तो निन्यानवे प्रतिशत सम्भावना है कि वो शारीरिक योग करता है, हठयोग के आसन, मुद्राएँ आदि करता है। जबकि हठयोग, हठयोग प्रदीपिका के अनुसार ही सीढ़ी मात्र है। वास्तविक और आखिरी योग नहीं है हठयोग! लेकिन आज हठयोग ही योग के सामने एक बड़ी चुनौती बन कर खड़ा हो गया है। लोग हठयोग कर के ही संतुष्ट हो जाते हैं। जब आप हठयोग कर के ही संतुष्ट हो गए तो असली योग में आप प्रवेश कैसे करेंगे?

सीढ़ी, द्वार का विकल्प बन गयी है; और, सीढ़ी द्वार का विकल्प बन के द्वार की दुश्मन बन गयी है।

तो मैंने जो दो चुनौतियाँ बोलीं वर्तमान युग में योग के समक्ष – एक वृत्तियों का बल और दूसरा वृत्तियों से पलायन के प्रचुर साधन; इनमें आप एक तीसरी चुनौती भी जोड़ लें! सच्चे योग के सामने हठ योग दुर्भाग्यवश आज एक चुनौती बन गया है।

मैं हठ योग की उपयोगिता से इंकार नहीं कर रहा। शरीर को दीक्षित किया जाना ज़रूरी है। और बहुत लोग ऐसे हैं जिनके अगर शरीर को दीक्षित नहीं किया गया, तो वो मन के तल पर कभी पहुँच ही नहीं सकते; क्योंकि, जो आदमी जिस तल पर है, उसकी शिक्षा-दीक्षा की शुरुआत वहीं से हो सकती है।

जो शरीर से बहुत ज़्यादा तादात्म्य रखता हो, जो बहुत देहभाव में जीता हो, उसकी आध्यात्मिक शिक्षा की शुरुआत तो देह से ही होगी। इसीलिए हठयोग आवश्यक है; क्योंकि हठयोग का पूरा ताल्लुक देह से है। तो मैं हठयोग की उपयोगिता से इंकार नहीं कर रहा, लेकिन हठयोग के बाद व्यक्ति को अष्टांगयोग में आरूढ़ होना चाहिये, प्रविष्ट होना चाहिये। वो कहीं होता नहीं दिखता।

लोग वज़न घटाने के लिये, स्वास्थ्य लाभ करने के लिए योग का सहारा ले रहे हैं। योग सिर्फ़ इसीलिए नहीं है कि तुम स्वास्थ्य लाभ कर के रुक जाओ। ये तो हमने योग को व्यायाम के तल पर उतार दिया।

योग, व्यायाम नहीं है। पर अधिकाँश लोग योग का इस्तेमाल सिर्फ देह को चमकाने के लिए कर रहे हैं। ये योग के साथ बड़ा हमने अन्याय कर डाला; और क्योंकि योग के साथ अन्याय किया नहीं जा सकता, तो वास्तव में हमने अपने ही साथ अन्याय कर डाला।

~आचार्य प्रशांत
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

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सोचने के अलावा और कोई चिंता नहीं होती

सारी झुंझलाहट तुम्हारी शुरू किस क्षण होती है, कभी देखा तुमने ये? तुम्हारी सारी झुंझलाहट शुरू कब होती है? तुम सो रहे हो, और तुम्हें

जो संसार से मिले सो समस्या; समस्या का साक्षित्व है समाधान

सारी चिंता, या सारी प्रसन्नता शुरू किस समय होती है? जब आँखों के सामने संसार आता है, और संसार का बड़ा हिस्सा है समाज, जो इंसान ने बनाया, ये पूरा मॉहौल। ये जैसे ही इन्द्रियों के माध्यम से मन में घुसता है, आक्रमण करता है वैसे ही चिंता शुरू, और इसका कोई उपचार नहीं है, क्योंकि इसकी परिभाषा ही यही है। अगर इसने मन को जकड़ लिया, तो चिंता होनी ही होनी है। तुमने आँख खोली और बाहर उपद्रव देखा, चिंता शुरू, क्योंकि उपद्रव सीधा आँखों से घुस कर के मन तक पहुँचा और मन को अपनी गिरफ्त में ले लिया। तुम कुछ कर नहीं पाओगे। तो ये तो बड़ी लाचारगी की हालत हो गयी, क्या करें? कुछ करा जा सकता है। करा ये जा सकता है कि तुम अपने आप को मन से ज़रा हटा लो, मन तो पकड़ में आ ही जाएगा संसार की क्योंकि मन बना ही संसार से है।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

अद्वैत बोध शिविर
हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)
आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

   जागृति माह
   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

 आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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साक्षित्व का वास्तविक अर्थ

जो सोचने की वस्तु हो, उसके बारे में सोचो और जो सोचने की वस्तु नहीं है, उसके बारे में नहीं सोचो, बस यही आध्यात्म है पूरा। जिसके बारे में सोचा जा सकता है, उसके बारे में खूब सोचो पर कृपा करके उसके बारे में मत सोचने लग जाओ, जिसके बारे में सोचना व्यर्थ है। हम उलटे हैं, जिसके बारे में सोचना चाहिये वहाँ हम सोचने से डरते हैं, हम विचार भी तो नहीं करते ताकतवर, पूर्ण, गहरा विचार हम कहाँ करते है? डरते हैं। जहाँ सोचना चाहिये, वहाँ हम सोचते नहीं और जहाँ सोचना मूर्खता है, वहाँ हम खूब सोच का जाल फेंकते रहते हैं।
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4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
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