प्रशंसा – स्वास्थ्य का भ्रम

निंदक मेरा जनि मरु, जीवो आदि जुगादि ।  कबीर सतगुरु पाइये, निंदक के परसादि ॥ वक्ता: स्वास्थ्य स्वभाव है और स्वस्थ होने का मतलब होता

चोट देता है अखंड, लेकिन प्रेम में

प्रश्न: हम अखंड (इंडिविजुअल) क्यों बनें ? हम निजता क्यों साधें ? वक्ता: क्योंकि तुम ‘बन’ नहीं सकते अखंड (इंडिविजुअल)| वो तुम हो| कोई नहीं कह रहा तुमसे

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