जो वचन आपसे न आए, वही मीठा है

जो स्वयं शीतल है, मात्र वही दूसरों को शीतलता दे सकता है। जब तक तुम शीतल नहीं, तब तक तुम दुनिया को मात्र जलन ही दोगे। तपता हुआ लोहा अगर किसी को स्पर्श करे, तो उसे शीतल थोड़े ही कर देगा।

हम सब जलते हुए पिंड हैं, हमारा होना ही जलन है हमारी। हमारा अहंकार ही जलन है हमारी, हम जहाँ से निकल जाते हैं, वहां आंच फैला देते हैं ।
कभी गौर किया है आपने कि आपके होने भर का, आपके माहौल पर क्या प्रभाव पड़ता है ? हम में से अधिकांश ऐसे हैं कि किसी शांत जगह पर पहुँच जाएँ, तो जगह पूरी कम्पित हो जाए, जैसे भूचाल। कभी आप कहीं मौन बैठे हों, तो फिर आपकी नज़र में आया हो, कि एक विक्षिप्त मन आता है, और ऐसे उसके कदम होते हैं, ऐसे उसके वचन होते हैं, ऐसा उसका होना होता है कि उसको पता भी नहीं लगता कि उसने शांत झील में कैसी कैसी लहरें उठा दीं। जैसे साफ़ फर्श हो, और किसी के क़दमों में कीचड़ ही कीचड़ लगा हो, और वो ऐसा बेहोश कि वही अपने पैर ले कर के साफ़ सफ़ेद फर्श के ऊपर से निकल गया। उसे पता भी नहीं उसने क्या कर दिया। ऐसे हम होते हैं।

जिसके अपने पाँव गंदे हैं, वो कहीं क्या सफाई लाएगा ? उन्हीं क़दमों से चल के तो सफाई करने जाएगा, जहाँ जाएगा वहीं गन्दा करेगा। आप शीतल, तो दूसरे शीतल। आत्मार्थ ही परमार्थ है। अपनी मुक्ति के लिए ध्यानस्थ रहो, यही परमार्थ है।
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हर आदर्श संकुचित करता है

आदर्श की जगह, मैं तुम्हें एक दूसरा शब्द दे रहा हूँ: दर्शन। मूलधातु दोनों शब्दों की एक ही है, आदर्श की और दर्शन की धातु एक ही है पर मैं तुमसे कह रहा हूँ : दर्शन। दर्शन का अर्थ है जानना। जानना, देख पाना। साफ़-साफ़ देखो और तुम्हें उधार की आंखें लेने की ज़रूरत नहीं है, अपनी आँखों से देखो न! तुम सीखना ही चाहते हो अगर, तो अस्तित्व में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे सीखा नहीं जा सकता। यदि आदर्श बनाने का पूरा उद्देश्य ही तुम्हारा यही है कि, ‘’मैं उस आदर्श से कुछ सीखूँगा,’’ तो सीखने के लिए तो पूरा अस्तित्व खुला हुआ है।
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कामनाग्रस्त मन जगत में कामुकता ही देखेगा

काम, जीवन का ही हिस्सा है, जीवन को नहीं समझा है, काम को भी नहीं समझा है, जब काम को समझा नहीं जाता तो सर चढ़ के बोलता है| जब काम को समझा नहीं जाता, तो वो बिलकुल हावी हो जाता है मन पर| वो फिर एक रोज़मर्रा की, आमतौर की, छोटी घटना बन कर नहीं रह जाता, फिर वो जीवन का एक हिस्सा नहीं, वो जीवन पर छाया हुआ बादल बन जाता है| जिसने सब कुछ ढक रखा है, मेरा उठना, बैठना, हंसना, छूना, सोचना, सब काम से भरा हुआ है|
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दूसरों को सिद्ध करने की ज़रुरत क्यों?

हार्दिक आमंत्रण आपको श्री प्रशांत के साथ २२वें अद्वैत बोध शिविर का|

मुक्तेश्वर के पर्वतों में गहन आध्यात्मिक आनंद का अनुभव करें|
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आवेदन आमंत्रित हैं:

अद्वैत बोध शिविर
श्री प्रशांत के साथ

(9 से 13 नवंबर, ’15)
मुक्तेश्वर, उत्तराँचल

मेल लिखें: bodh.camp@advait.org.in
जानकारी हेतु: रोहित राज़दान @ 9910685048

परिपक्वता क्या है?

प्रश्न: सर, परिपक्वता क्या है? वक्ता: (१८-२२ वर्ष की आयु के विद्यार्थियों की सभा को संबोधित करते हुए) यह शब्द ‘परिपक्वता’ हम सभी को अपने लिए महत्वपूर्ण

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