बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

जो वास्तव में बड़ा होता जाता है, कर्म वो भी करता है, पर उन कर्मों से उसकी कोई लिप्तता, कोई वासना नहीं होती।

कर्म भर करता है, फल छोड़ देता है।

फल दूसरों के लिए हैं।

अपनी इच्छा ही नहीं है कुछ पाने की।

कर्म पूरा है, फल की इच्छा नहीं है।

कष्ट का निवारण पता होने पर भी कष्ट से मुक्ति क्यों नहीं मिलती? || आचार्य प्रशांत (2019)

छोटे की बहुत बात करना, बड़े की उपेक्षा करने का बहाना बन जाता है।

एक बार जान लो कि कोई चीज़ छोटी है, फ़िर उसको छोटे जैसा ही व्यवहार दो।

छोटी -सी चीज़ से भी अगर आसक्ति है, तो वो छोटी-सी चीज़ इतने बड़े सूरज पर भी भारी पड़ती है।

छोटी -सी आसक्ति भी सत्य पर भारी पड़ जाती है।

अपनी छोटी-सी आसक्ति के कारण, तुम सत्य को छोड़ने को तैयार हो जाते हो।

तुम भूल जाते हो कि ये सब कुछ किसके दम से है?

सत्संग के बावजूद भी मन में गलत ख्याल क्यों आते हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)

तुम बड़े बेईमान पखेरू हो।

तुम न यहाँ के हो, न वहाँ के हो।

ऐसा भी नहीं कि राम के प्रति तुम्हारी बेईमानी है, तो संसार के प्रति तुम्हारी ईमानदारी है।

तुम दुनिया के भी नहीं हो।

बोध के लिए अभी कितनी यात्रा बाकी है? || आचार्य प्रशांत (2019)

वो माँग आपको ही तो पूरी करनी है।

आप अगर उसको पूरा नहीं कर रहे हैं तो इसका मतलब वो माँग अभी प्रबल नहीं है।

भीतर से निर्लिप्तता की माँग उठ रही है अगर, तो उसको पूरा कौन करने वाला है?

आपको ही तो करना है।  

आप उस माँग की जगह किन्हीं अन्य माँगों को अभी पूरा कर रहे होंगे।

निर्लिप्तता की माँग ज़ोर पकड़ेगी, नारे लगाएगी, परेशान करेगी।

फिर आप उसे पूरा करेंगी।  

गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है? || आचार्य प्रशांत (2019)

संसार का मतलब ही है कि वहाँ तुम्हें कोटियाँ मिलेंगी, वर्ग मिलेंगे, और विभाजन मिलेंगे।

परमात्मा के दरबार में न श्रेणियाँ हैं, न वर्ग हैं, न विभाजन हैं।

वहाँ ‘दो’ ही नहीं हैं, तो बहुत सारे कैसे होंगे?

दुनिया में बहुत सारी चीज़ें हैं।

दुनिया में तुम कहोगे कि फलाने दफ़्तर में एक नीचे का कर्मचारी है, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का।

‘वहाँ’ ऊपर दो नहीं होते, ‘वहाँ’ एक है।

1 2 3 21