विधियों की सीमा

चुपै चुप ना होवई जे लाइ रहा लिव तार                      – जपुजी साहिब(पौड़ी १) अनुवाद: मौन धारण

खोजना है खोना, ठहरना है पाना

मन भटक रहा है, और मन व्यापारी प्रकृति का है। वो ये सोचता है कि जो मिलता है, वो लेन-देन से मिलता है। बंजारे यही करते हैं, अदला-बदली, लेन-देन। लेन-देन से आशय यह है कि मैं हमेशा बना रहूं। कुछ दूंगा, तो बदले में कुछ लूंगा भी, ताकि मेरा होना घटे न। और संसार का यही क़ायदा भी है, यहां जो है, वो सिर्फ़ व्यापार है।

सुनना ही मोक्ष है

सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ ॥२॥ (श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी, अंग ६६०) वक्ता: सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ| सुन-सुन कर मैं

मंदिर-जहाँ का शब्द मौन में ले जाये

प्रश्न: ‘अनहता सबद बाजंत भेरी’, कृपया इसका अर्थ बताएँ? वक्ता: मंदिर से जो घंटे, घड़ियाल, ढोल, नगाड़े की आवाज़ आ रही है; वो ‘अनहद’ शब्द है | घंटा जैसे बजता

1 2