परम समर्पण

सभी गा रहे हैं: तू प्यार का सागर है….. श्रोता : सर, जैसे इसमें कहा गया है, इंटेलिजेंस के बारे में कि इंटेलिजेंस अनंत है

साथ हैं, क्योंकि प्रेम है, या आदत है?

प्रश्न: क्या अकेले रहने से हमारा विकास हो सकता है? वक्ता: बेशक! समझो इस बात को। बाहर से जो तुम्हें मिलता है, वो हमेशा बाहरी

जीवन का परमसुख क्या है?

प्रश्न: जीवन का ऊँचे से ऊँचा सुख क्या है? वक्ता: जीवन का ऊँचे से ऊँचा सुख क्या है, अब इसमें, ध्यान सारा परम सुख की

यह तो प्रार्थना नहीं

प्रश्न: क्या प्रार्थना से मन बदल सकता है? वक्ता: हाँ, ज़िन्दगी को पूरी समग्रता में जीने से जिसमे शोर ना हो। देखो, प्रार्थना का मतलब

परम लक्ष्य पहले, बाकी लक्ष्य बाद में

वक्ता: जहाँ कहीं भी तुम परम लक्ष्य बनाओगे, उससे चाहते तो तुम एक प्रकार की ख़ुशी ही हो। यही तो चाहते हो और क्या चाहते

आत्म-सम्मान और अहंकार

प्रश्न: सर, ईगो(अहंकार) और सेल्फ-रेस्पेक्ट(स्वाभिमान), ये दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं, या ये सिर्फ हमारे सोचने के ऊपर है? वक्ता: ‘सेल्फ-रेस्पेक्ट’ तो बाद में आता है।

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