न एकाग्रता, न नियंत्रण, मात्र होश

वक्ता: जतिन ने पूछा है कि मन को नियंत्रित कैसे करें? मन को अपने अधीन कैसे करें? मन को संयम में कैसे लाएँ? और उसी

घूँघट के पट खोल रे

वक्ता: मन जब भी विचार करता है कि धन्यवाद देना है, प्रेम उठता है। तो मन को उसको एक नाम देना ही पड़ेगा। यह तो

जिस तन लगया इश्क़ कमाल- बुल्ले शाह

जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल, नाचे बेसुर ते बेताल | टेक | दरदमंद नूं कोई न छेड़े, जिसने आपे दुःख सहेड़े, जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,

एकाग्रता का मुद्दा

प्रश्न: कंसंट्रेशन के बारे में सवाल है, एकाग्रता| कितने लोग यहाँ बैठे हो जो एकाग्र होना चाहते हो पर पाते हो की हो नहीं पाते?

कैसे जियें?

जो भी कुछ कर रहे हो, खेल रहे हो तो पूरी तरह खेलो, सुन रहे हो तो सिफ सुनो, खा रहे हो तो सिर्फ खाओ, पढ़ रहे हो तो सिर्फ पढ़ो, बोल रहे हो तो पूरा ध्यान सिर्फ बोलने में, तब भूल जाओ कुछ भी और, यही ज़िन्दगी है, यही जीवन है। प्रतिपल जो हो रहा है, यही तो जीवन है, इससे अलग थोड़ी कुछ होता है जीवन।

दूसरों को आदर्श बनाने की जगह खुद को देखो

वक्ता: सिर्फ एक व्यक्ति है जिसका तुम्हें सच पता हो सकता हैं, किसका? सभी श्रोता: अपना वक्ता: तो उसकी ओर क्यों नहीं देखते? जिस एक

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