डराने वाले को छोड़े बिना डर कैसे छोड़ दोगे

डर जब ख़ूब ही परेशान कर लेगा तब ईमानदारी से तत्काल छोड़ ही दोगे। जानते तो हो ही कि डर आता कहाँ से है। बिना किसी विषय के डर खड़ा नहीं रह सकता। डर को कोई विषय चाहिए। और विषय को इसलिए नहीं छोड़ पाते क्योंकि उससे तुमने अपनी पहचान बना रखी है—”यही तो मैं हूँ, इसको छोड़ कैसे दूँ?”

डर तुमसे बाहर थोड़े ही है कुछ; न क्रोध, न कामना, न संचय, अपने आपको जो मानते हो, वही है।

एक ही तथ्य है और एक ही सत्य; दूसरे की कल्पना ही दुःख है

मन ऐसा हो कि उसमें जब भी ख़याल उठें, तो साथ ही साथ यह भाव भी उठे, एक और ख़याल भी उठे, कि ख़याल व्यर्थ हैं।
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श्री प्रशांत ‘मिथक भंजन यात्रा’ का दूसरा चरण धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में आरम्भ कर रहे हैं।

25 अप्रैल से।

कृपया अपनी जगह आरक्षित कर लें।

प्रेमियों का प्रेम अक्सर हिंसामात्र है

प्रेम माने जब किसी से यूँही बिना वजह, अकारण, निःस्वार्थ, जुड़ गए हो।

वजह कुछ नहीं, सम्बन्ध फिर भी है।

अगर वैसा कुछ भी है तुम्हारी ज़िन्दगी में तो वो प्रेम है।
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श्री प्रशांत ‘मिथक भंजन यात्रा’ का दूसरा चरण धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में आरम्भ कर रहे हैं।

25 अप्रैल से।

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मुक्ति का पहला चरण – शरीर का सहज स्वीकार

जो शरीर को दबायेगा, शरीर उसके ऊपर छा जायेगा।
उसके रेशे-रेशे से, बस शरीर आवाज़ देगा, क्योंकि शरीर को तुम दबा सकते नहीं।
फिर शरीर इधर से, उधर से, हज़ार तिकड़में कर के, अपने आप को अभिव्यक्त करेगा।

जो जगह शरीर को नहीं लेनी चाहिये, उस जगह पर भी शरीर जा कर के बैठ जायेगा।
शरीर तुम्हारी पूजा भी बन जायेगा, शरीर तुम्हारा प्रेम बन जायेगा,
यहाँ तक कि तुम्हारा मोक्ष भी शरीर बन जायेगा।

जिन्होंने शरीर को खूब दबाया होता है, वो जब मोक्ष की भी कल्पना करते हैं,
तो यही सोचते हैं कि हम ऐसे ही कहीं और अवतरित हो जायेंगे।
“हमें मोक्ष मिल गया, अब हम ऐसे ही किसी और लोक में पहुँच जायेंगे, सशरीर।”

शरीर से मुक्ति चाहते हो, तो शरीर को ‘शरीर’ रहने दो।
जिन्हें शरीर से मुक्ति चाहिये हो, वो शरीर के दमन का प्रयास बिल्कुल न करें।
जिन्हें शरीर से ऊपर उठना हो, वो शरीर से दोस्ती करें।
शरीर से डरें नहीं, घबरायें नहीं।

वहीँ मिलेगा प्रेम

अनाड़ी मन जो होता है उसके लिए जमीन का प्रेम, जमीन से बंधे रहने की जंजीर बन जाता है। और जो ज्ञानी होता है उसके लिए ज़मीन का प्रेम, आसमान में उड़ने का पंख बन जाता है। अनाड़ी मन के लिए तथ्य सिर्फ एक बंद कोठरी रह जाते हैं, मुर्दा तथ्य। और जागृत मन के लिए, यही तथ्य सत्य का द्वार बन जाते हैं। जमीन तुम्हारा बंधन भी है और तुम्हारा अवसर भी। इसी से चिपके रह गए और ध्यान न दिया और समर्पित न हुए, तो इससे बड़ा बंधन नहीं है।

सँसार महा बंधन है, पर यही सँसार, मुक्ति का अवसर भी है। सब-कुछ तुम पर निर्भर करता है।

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