अभी और कितना सहारा चाहिए तुम्हें?

जिस स्मृति से धोखा खाते हो, वो स्मृति भी किसने दी है? जिस माया के कारण ‘उसको’ भूलते हो, वो माया भी उसी की है। तो अब और क्या माँग रहे हो?

‘वो’ अपने होने पर भी है और अपने न होने पर भी है। तो अब और क्या माँग रहे हो? जब सत्य है, तब तो सत्य है ही, जब सत्य नहीं है, तो माया है। और माया क्या है? माया भी तो सत्य का ही रूप है। छाया है सत्य की। ‘वो’ अपने होने में भी है, ‘वो’ अपने न होने में भी है; अब प्रार्थना क्या कर रहे हो, माँग किस चीज़ की है? या तो मिलेगा या तो नहीं मिलेगा। मिला तो मिला, नहीं मिला तो भी मिला। जीते तो जीते, हारे तो भी जीते। कृष्ण कहते हैं अर्जुन से कि, “या तो मुझे पाएगा, नहीं तो मेरी माया में फंस जाएगा। दोनों ही स्थितियों में हूँ तो मैं ही।”
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

स्वयं का विसर्जन ही महादान है

दान वो नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा, जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है, क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो और जिसको तुमने अपना आपा, अपना ‘मैं’, अपना स्वयं घोषित कर रखा है, वही तुम्हारा कष्ट है, वही तुम्हारा अहंकार है। वही तुम्हारे पाओं की बेड़ियाँ और अहंकार का बोझ है। जब तुम दान करते हो, तब तुम किसी और पर एहसान नहीं करते। जब तुम दान करते हो, तो अपने आप पर एहसान करते हो क्योंकि जो तुम दान कर रहे हो, वो वास्तव में तुम्हारी बीमारी है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जा रहा है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों को पढने का अद्भुत मौका व्यर्थ न जाने दें।

आवेदन हेतु ई-मेल करें: requests@prashantadvait.com

किसी अन्य जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

श्री कुंदन सिंह: +91 – 9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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 मन के बहुतक रंग हैं

ऐसे समझो यहाँ पर अगर तुम सोई हुई हो तो कितने भी सवाल पूछे जाते रहें, क्या तुम्हें पता चलेगा कि सवाल पूछे गए? यानि कि पूछने वाला और जानने वाला दो अलग-अलग इकाईयाँ हैं। पूछा जा सकता है बिना जाने कि पूछा गया? स्लीप-वॉकर होते हैं जो रात में नींद में चलते हैं? वो चल लेते हैं बिना जाने कि चला गया। यानि कि चलने वाला और जानने वाला, दो अलग-अलग हैं। तभी तो चला जा सकता है बिना जाने कि मैं चल रहा हूँ। होता है कि नहीं होता है? जान नहीं रहे हो कि चल रहे हो पर रात में चल रहे हो। यानि कि चलने वाला और जानने वाला दोनों अलग अलग हैं, हैं न?
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आचार्य प्रशांत के साथ 26वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है।

दिनांक: 26-29नवम्बर
स्थान: शिवपुरी, ऋषिकेश, उत्तराखंड

आवेदन हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

बोध में स्मृति का क्या स्थान है?

जैसे अनंत विस्तार का कोई केंद्र नहीं हो सकता न। कुछ सीमित है, तो उसका केंद्र बना सकते हो। अनंतता का, इन्फिनिटी का कोई केंद्र नहीं हो सकता। तो यह संभव है कि मन रहे पर मन का कोई केंद्र न रहे। यह बिलकुल संभव है। तब स्मृतियाँ रहेंगी, यादें रहेंगी पर कोई केंद्र नहीं होगा जहाँ से याद कर रहे हो।
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आप सभी आमंत्रित हैं:

‘स्पिरिचुअल हीलिंग’ पर आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में।

दिनांक: बुधवार, 26.10.2016

समय: 6:30 p.m से

स्थान: तीसरी मंजिल,G-39, सेक्टर-63 , नॉएडा
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

योग का क्या अर्थ है?

योग के लिए कुछ पाना नहीं है। जिस ‘एक’ पर आप बैठे थे उसके साथ-साथ ‘दूसरे’ को भी देख लेना है। योग का अर्थ समझिए, योग का अर्थ है- आप पुण्य पर बैठे हो, तो आप योगी नहीं हो सकते, क्यूँ? क्यूँकी पाप वहाँ दूर बैठा है और वो आपकी दुनिया से निष्कासित है। ठीक? आप योगी नहीं हो सकते। योगी होने का अर्थ है- मैं पुण्य पर बैठा हूँ और एक काबीलियत है मुझमें कि मैं पाप पर भी चला जाऊँ, बिलकुल करीब चला जाऊँ उसके, बिल्कुल, बिल्कुल करीब। इतना करीब कि पापी कहला ही जाऊँ और वहाँ जा करके साफ़-साफ़ मैं ये देख लूँ कि पाप का तत्व भी वही है जो पुण्य का तत्व है- ये योग है। रंग अलग-अलग है दोनों के पर तत्व एक हैं। यही योग है। अब दोनों एक हैं। समझ में आ रही है बात?
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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डराने वाले को छोड़े बिना डर कैसे छोड़ दोगे

डर जब ख़ूब ही परेशान कर लेगा तब ईमानदारी से तत्काल छोड़ ही दोगे। जानते तो हो ही कि डर आता कहाँ से है। बिना किसी विषय के डर खड़ा नहीं रह सकता। डर को कोई विषय चाहिए। और विषय को इसलिए नहीं छोड़ पाते क्योंकि उससे तुमने अपनी पहचान बना रखी है—”यही तो मैं हूँ, इसको छोड़ कैसे दूँ?”

डर तुमसे बाहर थोड़े ही है कुछ; न क्रोध, न कामना, न संचय, अपने आपको जो मानते हो, वही है।

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