पूर्ण जीवन, पूर्ण मृत्यु

मन को दौड़ाना नहीं है, मन को साफ़ रखना है। मन साफ़ है तो सामने दिख जाएगा। करीब से करीब है वो, भीतर ही बैठा है वो, दिखने में देर कहाँ लगनी है? और मन गंदा है, तो लगाए रहो चतुराई, दौड़ाए रहो मन को। जिधर देखोगे उधर संसार ही संसार दिखाई देगा। और तुम मजबूर होके कहोगे, “खूब ढूंढ लिया, सत्य है ही नहीं, मात्र संसार है।” संसार ही सत्य है, आँख साफ़ करो, आँख। नज़र का बड़ा पैनापन नहीं चाहिये, नज़र की निर्दोषिता चाहिये, नज़र की मासूमियत चाहिये। नज़र का भोलापन चाहिये।

आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर
हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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शिकायतें पीढ़ी दर पीढ़ी

अब माँ दिन-रात घर पर बैठ कर के घटिया धारावाहिक देख रही है| बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ रहा है – बच्चे के कान में भी तो आवाज जा ही रही है ना| माँ दिन-रात बैठ करके रिश्तेदारों की, पड़ोसियों की लड़ाई बुझाई करती हैं, “इसने ये कर दिया, उसने वो कर दिया, इसका ऐसा है, उसका वैसे है” तो बच्चा सुन नही रहा है? बच्चे के मन पर क्या प्रभाव जा रहा है? माँ-बाप की दिन-रात खट -पट होती है कि तुमनें कहा था इस दिवाली पेपर दिला दोगे इसपे भी नही दिलाया| वो कह रहा है, “दिला तो दिया”, वो कह रही है, “पर ये तो बहुत हल्का है; भारी वाला ले के आते, कुंदन का चाहिए|” और बच्चा सुन नही रहा है ये सब?

अस्वस्थ अभिवावकों से स्वस्थ बच्चा कैसे आएगा? मैं फिर कह रहा हूँ ‘असली माँ-बाप वो जो शारीरिक रूप से जन्म दें और फिर मानसिक रूप से भी जन्म दे पाएँ| तब असली माँ-बाप हुए, वो कम होते हैं|

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अभिनय का मतलब नकली होना नहीं है

आज तक गुस्सा कर के कोई खुश नहीं हुआ| नफ़रत कर के किसी को आनंद नहीं अनुभव हुआ| तुम खुद नहीं चाहते कि तुम्हें गुस्सा आए| तुम खुद नहीं चाहते तुम नफ़रत करो| ये सब चीज़े खुद अपने आप हट जाएँ क्योंकि तुम खुद इनको नहीं चाहते हो| पर तुम इन्हें पालते हो| क्यों? मन में वैहम गया है कि गुस्सा करने से मेरी अहमियत बढ़ती है| मन में एक वहम बैठ गया है कि नफ़रत करना ज़रूरी है अगर मुझे अपना प्यार सिद्ध करना है| तुम जानते हो हम नफ़रत अक्सर क्यों करते हैं? क्योंकि हम किसी को अपना प्यार सिद्ध कर रहे होते हैं|
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धोखा भावनाओं का

भावुकता कुछ नहीं है| जब विचार का असर शरीर पर दिखने लगे, तब उसे भावुकता कहते हैं| तो भावना क्या है? भावना, विचार ही है जो अब दिखाई दे रहा है क्योंकि शरीर हिलने लग गया है, आँसू गिरने लग गए हैं, चेहरा लाल होने लग गया है| जब शरीर भी विचार का शिकार हो जाए, तो उस स्तिथि को क्या कहते हैं? भावना| उसमें कुछ ख़ास नहीं है|

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मेहनत या स्मार्टनेस?

हम जब यह सवाल पूछ लेते हैं कि स्मार्ट वर्क करू कि हार्ड वर्क पर यह तो पूछते ही नहीं हैं कि उस कार्य को करने वाला कौन है? इसी कारण उस कर्म की उस कार्य की दिशा क्या है ये कभी नहीं पूछते। सवाल तो पूछ लेते हैं। यह नहीं पूछते कि किस चित्त से सवाल उठ रहा है? मैं कभी भी सवालों के जवाब नहीं देता हूँ। सवाल तो सतही होते हैं। मैं जो सवाल देता हूँ, उसमे मैं मन को समाधान देता हूँ। उस मन को, जिस मन से प्रश्न उठा है।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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