एकांत नहीं है कोना निर्जन, कैवल्य नहीं कोरा सूनापन

ये सब मक्खी-मच्छर, कीड़े-मकौड़े, इन पर ध्यान तब जाता है जब प्रेमी साथ नहीं होता। चूँकि वो साथ में नहीं है इसलिए दुनियाभर से बहुत शिकायतें हो जाती हैं। आप झुंझलाए से रहते हो, आप कटुता से भरे हुए रहते हो और आप कटुता से भरे हुए हो ही इसीलिए क्यूँकी जीवन में प्रेम नहीं है। वो जो ऊँचा प्रेमी उपलब्ध हो सकता था, वो आपको मिला नहीं हुआ है। जब वो नहीं मिला होता है तो दुनिया भर की बेमतलब की चीज़ें जीवन में आ जाती है क्यूँकी जगह खाली है न। जिस आसन पर परम को विराजमान होना था वो आसन खाली है तो उसपर इधर-उधर से आकर के कुछ भी कचरा जमा होगा। फिर आप शिकायत करोगे कि ‘’कचरा बहुत इकठ्ठा हो गया है जी, इसे हटाएँ कैसे?’’ हटाते रहो। जो कुर्सी खाली होती है, उसे रोज़ साफ़ करते रहो तो भी अगले दिन उसपर धूल जम ही जाती है।
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आप सभी आमंत्रित हैं:
‘स्पिरिचुअल हीलिंग’ पर आचार्य प्रशांत द्वारा बोध सत्र में।
दिनांक: बुधवार, 26.10.2016
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39, सेक्टर 63,नॉएडा
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

स्रोत की तरफ़ बढ़ो

सिर को झुकाकर बिल्कुल ऐसे हाथ खोल दो।
आँचल फैला दो, (हाथ खोलते हुए) ठीक ऐसे।
सिर को झुकाकर ग्रहण करो। और उसके बाद फिर कोई कंजूसी नहीं।
दिल खोलकर बाँटो, भले ही उसमें तुम्हें गालियाँ मिलती हों, भले उसमें कोई चोट देता हो –
यही मज़ा है जीने का। जीना इसी का नाम है।

मुफ़्त का लेते हैं, और मुफ़्त में बाँटते हैं – यही हमारा व्यापार है। यही धंधा है हमारा।
क्या धंधा है? मुफ़्त में लो! मुफ़्त में मिलता है।
‘वो’ तुमसे कोई कीमत माँगता ही नहीं।
एक बार तुमने सिर झुका दिया, उसके बाद ‘वो’ कोई क़ीमत नहीं माँगता।
कीमत यही है कि सिर झुकाना पडे़गा। इसके अलावा कोई कीमत माँगता ही नहीं, मुफ़्त में मिलेगा सब।

मृत्यु में नहीं, मृत्यु की कल्पना में कष्ट है

प्रश्न: मृत्यु से भय इसलिए नहीं लगता कि शरीर छूट जाएगा, पर मृत्यु से पहले का कष्ट आक्रांत करता है| इस कष्ट से बचने का

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