दुर्बलता को पात्रता कहना ही भिक्षावृत्ति है

जो इंसान खुद भिखारी नहीं होगा, वो दूसरे भिखारियों के लिए भी दया की भावना नहीं रखेगा।
तो यह तो एक आपसी साजिश है, वो तो अपने ही समुदाय के बीच में है। जिसमें हमारा भ्रम है कि एक भिखारी है, और दूसरा दाता है। यह तो भिखारियों की आपसी मण्डली है, जिसमें एक दूसरे को थोड़े बहुत पैसे दिए जा रहे हैं। अभी चौराहे पर देते हैं, फिर गाड़ी लगा कर ऑफिस में जाकर हाथ फैला देंगे। तो कौन भिखारी है और कौन नहीं है?
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1.) अद्वैत बोध शिविर
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जानकर यदि भूल गये तो कभी जाना ही नहीं

सौ साल भक्ति कर के यदि कोई फिसलता है, तो पक्का है कि भक्ति झूठी थी, इसी कारण फिसले। पर अगर कोई सौ साल नरक जैसा जीवन जी करके, एक दिन अचानक जग जाता है, तो ये मत समझ लेना कि जग इसलिए गया क्योंकी वो नरक जैसा जीवन जीया।

‘फिसलने’ के कारण होते हैं, ‘उठना’ कृपा होती है। कारण और कृपा में भेद करना सीख लो। ‘नरक’ के कारण होते हैं, ‘स्वर्ग’ कृपा होती है।
तो सौ साल भक्ति करके, अगर फिसल गए हो, तो कार्य कारण का सम्बन्ध चलेगा। तुम्हारा फिसलना इस बात का सबूत है कि पिछले सौ साल भी झूठे थे।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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माफ़ करने का क्या अर्थ है?

ना सजा देनी है, न माफ़ करना है। मदद कर सकते हो, तो कर दो और सोए हुए की क्या मदद की जा सकती है? कि उसको जगा दो कि बहुत सो लिया। उठेगा कब? कब तक सपनों में जीता रहेगा? भ्रम में कब तक तेरा मन रहेगा? ऑंखें खोल, हक़ीक़त को देख पर हम यह करते नहीं।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
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श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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अनुकम्पा का क्या अर्थ है?

ठीक इसी तरीके से, भीतर से साफ़-सुथरे, सहज, शुद्ध होने के बावजूद ये संभावना है कि
कुछ परिस्थितियों में तुम्हारे कर्म ठीक ना बैठें,
क्योंकि भीतर जो है, वो तो बड़ा है, पूर्ण है, असीमित है,
पर कर्म रूप में उसकी जो अभिव्यक्ति होती है, वो तो सदा सीमित होती है।

कोई गारंटी नहीं होती इस बात की कि उसका परिणाम कैसा आएगा।

बात समझ रहे हो?

‘ग्रेस’ वो होती है जो सभी प्रतिकूल परिणामों से तुम्हारी रक्षा करती है।

स्रोत की तरफ़ बढ़ो

सिर को झुकाकर बिल्कुल ऐसे हाथ खोल दो।
आँचल फैला दो, (हाथ खोलते हुए) ठीक ऐसे।
सिर को झुकाकर ग्रहण करो। और उसके बाद फिर कोई कंजूसी नहीं।
दिल खोलकर बाँटो, भले ही उसमें तुम्हें गालियाँ मिलती हों, भले उसमें कोई चोट देता हो –
यही मज़ा है जीने का। जीना इसी का नाम है।

मुफ़्त का लेते हैं, और मुफ़्त में बाँटते हैं – यही हमारा व्यापार है। यही धंधा है हमारा।
क्या धंधा है? मुफ़्त में लो! मुफ़्त में मिलता है।
‘वो’ तुमसे कोई कीमत माँगता ही नहीं।
एक बार तुमने सिर झुका दिया, उसके बाद ‘वो’ कोई क़ीमत नहीं माँगता।
कीमत यही है कि सिर झुकाना पडे़गा। इसके अलावा कोई कीमत माँगता ही नहीं, मुफ़्त में मिलेगा सब।

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