मृत्यु में नहीं, मृत्यु की कल्पना में कष्ट है

प्रश्न: मृत्यु से भय इसलिए नहीं लगता कि शरीर छूट जाएगा, पर मृत्यु से पहले का कष्ट आक्रांत करता है| इस कष्ट से बचने का

खोजना है खोना, ठहरना है पाना

मन भटक रहा है, और मन व्यापारी प्रकृति का है। वो ये सोचता है कि जो मिलता है, वो लेन-देन से मिलता है। बंजारे यही करते हैं, अदला-बदली, लेन-देन। लेन-देन से आशय यह है कि मैं हमेशा बना रहूं। कुछ दूंगा, तो बदले में कुछ लूंगा भी, ताकि मेरा होना घटे न। और संसार का यही क़ायदा भी है, यहां जो है, वो सिर्फ़ व्यापार है।

चोट देता है अखंड, लेकिन प्रेम में

प्रश्न: हम अखंड (इंडिविजुअल) क्यों बनें ? हम निजता क्यों साधें ? वक्ता: क्योंकि तुम ‘बन’ नहीं सकते अखंड (इंडिविजुअल)| वो तुम हो| कोई नहीं कह रहा तुमसे

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