सहायता की प्रतीक्षा व्यर्थ है

जो होना है, अभी होना है।

भविष्य तुम्हें कुछ नहीं दे सकता।

वर्तमान के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।

संचय और डर

हम क्यों इकट्ठा करना चाहते हैं, जानते हो?

हमें लगता है कोई अनहोनी घट जाएगी कल| आगे पता नहीं क्या हो तो पहले से इंतज़ाम करके रख लो|

दुनिया में और कोई भी नहीं है जो इतना डरा हुआ हो| अस्तित्व में कोई भी इतना ज़्यादा खौफ़ज़दा है ही नहीं जितना इंसान है| सब को भरोसा है; सबको एक आंतरिक भरोसा है कि “जो भी होगा चल जायेगा काम”| उन्हें सोचने की जरूरत ही नही पड़ती |

प्रेम – आत्मा की पुकार

उठा बगूला प्रेम का, तिनका चढ़ा आकाश। तिनका तिनके से मिला, तिनका तिनके पास ।। – कबीर वक्ता : प्रेम से मन बचता ही इसीलिये

असली जीना माने क्या?

प्रश्न : पंचदशी में वर्णन किया गया है कि इन्द्रियों द्वारा जिन विषयों का ज्ञान होता है उन विषयों की उपेक्षा और अनादर कर देने

 तुम ही सुख दुःख हो

जिसकी सुरती जहाँ रहे, तिसका तहाँ विश्राम भावै माया मोह में, भावै आतम राम – संत दादू दयाल वक्ता : क्या कहते हैं कबीर भी?

भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

1 2 3 14