संचय और डर

हम क्यों इकट्ठा करना चाहते हैं, जानते हो?

हमें लगता है कोई अनहोनी घट जाएगी कल| आगे पता नहीं क्या हो तो पहले से इंतज़ाम करके रख लो|

दुनिया में और कोई भी नहीं है जो इतना डरा हुआ हो| अस्तित्व में कोई भी इतना ज़्यादा खौफ़ज़दा है ही नहीं जितना इंसान है| सब को भरोसा है; सबको एक आंतरिक भरोसा है कि “जो भी होगा चल जायेगा काम”| उन्हें सोचने की जरूरत ही नही पड़ती |

भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

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