जानकर यदि भूल गये तो कभी जाना ही नहीं

सौ साल भक्ति कर के यदि कोई फिसलता है, तो पक्का है कि भक्ति झूठी थी, इसी कारण फिसले। पर अगर कोई सौ साल नरक जैसा जीवन जी करके, एक दिन अचानक जग जाता है, तो ये मत समझ लेना कि जग इसलिए गया क्योंकी वो नरक जैसा जीवन जीया।

‘फिसलने’ के कारण होते हैं, ‘उठना’ कृपा होती है। कारण और कृपा में भेद करना सीख लो। ‘नरक’ के कारण होते हैं, ‘स्वर्ग’ कृपा होती है।
तो सौ साल भक्ति करके, अगर फिसल गए हो, तो कार्य कारण का सम्बन्ध चलेगा। तुम्हारा फिसलना इस बात का सबूत है कि पिछले सौ साल भी झूठे थे।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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ऊब कहीं बाहर से नहीं, तुम स्वयं से ही ऊबे हुए हो

जब कैंप में अनहद हो रहा था, तो जो चीख-पुकार मच रही थी, जो रोना था, चिल्लाना था, वो ढोलक की थाप से नहीं तुम्हारे भीतर जा रहा था, वो रात के अंधरे या चाँद के प्रकाश से तुम्हारे भीतर नहीं जा रहा था, वो तुम्हारे ही भीतर था जो अब बाहर आ रहा था। और अच्छा है कि तुम्हारे भीतर जो है वो बाहर आ जाए। ये रेचन है, ये शुद्धि है। अंतर समझ रहे हो? कोई बाहर वाला आकर के तुम्हें ऐसा कष्ट नहीं दे रहा था कि तुम चीखे मारने लग जाओ या बेहोश होकर गिरने लग जाओ। यदि तुम चीख रहे थे, ओर रो रहे थे, ओर बेहोश होकर के गिर रहे थे, तो उसकी वजह थी तुम्हारे दिल में पहले से ही जमा हुआ गुबार जो उस स्थिति में अब बाहर आ रहा था। तुम भूल में मत पड़ जाना। ऐसी स्थितियों से भागने मत लग जाना कि ऐसी स्थितियों में तो बड़ा कष्ट होता है, कि हम रोने लग जाते हैं। तुम रोने लग नहीं जाते हो, तुम रो रहे ही हो। तुम्हारे आंसू उस क्षण में बस दिखने लग जाते हैं। तुम होश में आने लग जाते हो। तुम्हें तुम्हारी स्थिति साफ़-साफ़ दिखने लग जाती है।

कार्य-कारण

एक तरीका ये है चलने का कि मैं तर्क देता रहूँगा, तर्क देता रहूँगा, तर्क देता रहूँगा, मैं सोंचता रहूँगा, सोचता रहूंगा, और सोच-सोच कर अन्ततः जो अचिन्त्य है, उसको भी पा लूँगा, ये सुनने में ठीक लगता है और ये आपको दरवाज़े तक ले जा सकता है, पर ये आपको दरवाज़े के बाहर नहीं ले जा पायेगा। ठीक है न। आप तर्क करते रहें, तर्क करते रहें, तर्क करते रहें, कारण पर चलते रहें, तो ये बात आपको कराणों के दरवाज़े तक तो ले जा सकती है, पर अकारण में प्रवेश नहीं करा पायेगी। दूसरी ओर अगर एक झटके में ही आप सीधे अकारणीय में स्थित हो जाएँ। तो ये जितने कारण हैं – कारण माने मन — मन का पूरा काम-धाम, मन की पूरी चाल अपनेआप स्पष्ट हो जाएगी। कहने का आशय ये है कि मन के ही भीतर रहकर के तो मन को भी नहीं समझा जा सकता। मन को भी अगर वास्तव में समझना है तो कहीं ऐसी जगह आसन लगाना होगा जो मन से बाहर है। किसी ऐसे की अनुकम्पा चाहिए होगी जो मन के बाहर है।

चलो ज्ञान में, पर स्थित बोध में रहो

मन को डुबोया या ये जाना कि मन तो डूबा हुआ है ही। मेरी एक-एक कोशिश उसको बस अलग करती है, डूबने से। उसके स्त्रोत से उसको दूर करती है, वरना मन तो डूबा हुआ है ही। मेरी एक-एक कोशिश, उसको बस अलग करती है। आपकी कोशिश जो है, कुछ भी करने की, भले वो डूबोने की कोशिश हो, आपकी कोशिशें ही तो बाधा है।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
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विचार नहीं वास्तविकता

विचार वास्तविकता का विकल्प बन जाता है।

ये ही तो हम करते हैं न अपनी कल्पनाओं में? जो हम वास्तविकता में नहीं कर पाते, हम उसकी कल्पना करना शुरू कर देते हैं। ये ही है न? विचार वास्तविकता का विकल्प बन चुका है।

तुम्हारी जो ऊर्जा सीधे कार्य में निकलनी चाहिए थी, वो ऊर्जा फ़ालतू ही कल्पना करने में जा रही है। ये उस ऊर्जा का विरूपण है।

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