खेल के जारी रहने में मज़ा है और काम के खत्म हो जाने में

खेल वो होता है, जो दो बच्चे खेलते हैं आपस में। वहाँ ये कोशिश नहीं की जाती कि जल्दी से जल्दी जीत लूँ और खेल ख़त्म हो जाए। वहाँ तो प्रेम में खेला जाता है और कहा जाता है कि ऐसा खेलो कि खेलते ही रहो। ये नहीं कहा जाता कि, “अरे वाह! पंद्रह अंक बनाने थे जीतने के लिए। मैंने पहले बना लिए। खेल ख़त्म।” न! तो बड़े जो खेल खेलते हैं, और बच्चे जो खेल खेलते हैं, उसमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। बड़े जो खेल खेलते भी हैं, वो खेल नहीं है। वो खेल भी हमारे प्रतियोगी मन से निकला है। वो हिंसा है एक प्रकार की। वो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का उपाय है।
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अपनी निजता क्यों खो देते हो?

हमारे दिमाग ऐसे ही हैं। उन पर निशान बहुत जल्दी पड़ जाते हैं। जैसे कि एक धातु की पट्टी हो। उसको आप एक बार मोड़ दो और फिर छोड़ो। तो क्या होता है? तुमने एक लोहे की पट्टी ली और उसकी मोड़ दिया। फिर छोड़ोगे तो क्या होगा? वो वैसी ही रहेगी जैसा कर दिया है। ये कहलाती है दिमाग की प्लास्टिसिटी। एक बार मन पर एक प्रभाव पड़ गया, तो वो मन को गन्दा कर के जाएगा। वो मन पर एक तरीके का निशान छोड़ करके जाएगा। वो एक प्रभाव पर से गुज़रा और वो हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। हमेशा के लिए।
दूसरी ओर लचीला दिमाग होता है। वो एक स्वस्थ दिमाग होता है। जो प्रभावों से गुज़र जाता है लेकिन रहता साफ़ है। उस पर कोई निशान हमेशा के लिए पड़ नहीं पाता। उसकी कंडीशनिंग नहीं हो पाती।
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जीवन एक अनवरत प्रार्थना हो

जब आप कहते हैं अनेक इश्वर हैं, तो आप बिलकुल दूसरी बात कह रहे हैं। ‘अनेक हैं नहीं, अनेक है’। है एक, पर है अनेक। एक ही है, पर अनेक है और ये अनेक होना, उसकी एकता का हिस्सा है। इस्लाम में इसी बात को शिर्क बोला जाता है। टू बिलीव इन अ गॉड अदर देन अल्लाह और इस्लाम की सनातन धर्म से एक बहुत बड़ी शिकायत ही ये है कि तुम बहुत सारे ईश्वरों में यकीन करते हो, बहुत सारे कैसे हो सकते हैं? बहुत सारों में यकीन नहीं किया जा रहा है, एक में ही किया जा रहा है पर वो जो एक है, वो अनेक है।

वो कण-कण में है, वो हर जगह है, वो सब में है बहुत सारों में नहीं कोई ये कर रहा है एक ही है और जो कहता हो कि बहुत सारे हैं वो पगला है। अनेक नहीं हैं। अनेक है; एक है जो अनेक है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 31वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
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मेहनत या स्मार्टनेस?

हम जब यह सवाल पूछ लेते हैं कि स्मार्ट वर्क करू कि हार्ड वर्क पर यह तो पूछते ही नहीं हैं कि उस कार्य को करने वाला कौन है? इसी कारण उस कर्म की उस कार्य की दिशा क्या है ये कभी नहीं पूछते। सवाल तो पूछ लेते हैं। यह नहीं पूछते कि किस चित्त से सवाल उठ रहा है? मैं कभी भी सवालों के जवाब नहीं देता हूँ। सवाल तो सतही होते हैं। मैं जो सवाल देता हूँ, उसमे मैं मन को समाधान देता हूँ। उस मन को, जिस मन से प्रश्न उठा है।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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